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अक्ल से परे के संबंध

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आलोक पुराणिक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
puranika@gmail.com
मद्रास उच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकार से पूछा है कि क्या टीवी धारावाहिकों के चलते विवाह से परे संबंधों को बढ़ावा मिल रहा है. न्यायालय ने इस संबंध में विशेषज्ञों की एक शोध समिति के गठन का सुझाव भी दिया है. विवाह के परे के संबंधों का ताल्लुक टीवी धारावाहिकों से क्या है, इसका पूरा शोध हो जाये, तो कई सवालों के जवाब मिल जायेंगे.
वैसे टीवी धारावाहिकों और फिल्मों में यह लिखकर आता है कि इनके सभी पात्र, घटनाएं वगैरह काल्पनिक हैं, उन पर यकीन ना करें. जैसे कोई पात्र तमाम टीवी धारावाहिकों और फिल्मों में बहुत ही संस्कारी दिखते हैं. पर उनके संस्कार काल्पनिक हैं, ऐसा उन पर लगे कई मीटू वाले आरोप बताते हैं.
विवाह से परे संबंधों का टीवी से रिश्ता-इस पर शोध हो, पर अक्ल से परे के संबंधों का टीवी से क्या रिश्ता है, इस पर तो जरूर शोध होना चाहिए. टीवी दर्शक भूतों को ज्यादा पसंद करते हैं या विवाह से परे संबंधों को.
चैनल आये दिन बताते रहते हैं कि फलां किले में भूत हैं. फलां सड़क पर रात को बारह बजे भूत आता है. लोग देखे जाते हैं, देखते ही जाते हैं. कई टीवी सीरियल आकर निकल लिये, पर भूतों की टीआरपी ना खत्म हुई. बड़ी-बड़ी अभिनेत्रियों की लोकप्रियता खत्म हो गयी, पर भूत कतई वैसे ही लोकप्रिय बने हुए हैं, जैसे कई सालों पहले थे.
भूतों की लोकप्रियता का राज क्या है, इस पर एक कमेटी बननी चाहिए. भूतों पर जनविश्वास कम ना हो पाये, तो जनहितकारी भूतों को बढ़ावा देने के प्रयास होने चाहिए.
कुछ मामले कई बार समझ में नहीं आते. जैसे कि जनता अपने नेताओं का भरोसा नहीं करती है, पर भूतों का भरोसा कर लेती है. शोध समिति जब विवाह से परे संबंधों के अध्ययन करेगी, तो पक्का है कि बाद में इनकी रोकथाम के लिए भी कोई अभियान छेड़ा जायेगा. भविष्य में विवाहेतर संबंधों की रोकथाम से जुड़े विज्ञापनों का स्कोप दिख रहा है.
कई रोजगारों का सृजन भी होगा. विवाहेतर संबंध रुक पायेंगे या नहीं, यह अलग विषय है, पर रोजगार-सृजन तय है. एकता कपूर के सीरियल दिखा रहे होंगे कि राहुल ने संजना का साथ छोड़कर रीटा का हाथ थामने की कोशिश की, पर रीटा पहले ही विवान के साथ जा चुकी थी, विवान संजना का दूसरा प्रेमी था. इस सीरियल के ब्रेक में इश्तिहार आयेगा- दिल पर रखें काबू, वरना ठुकेंगे बाबू.
मल्टी-अफेयरवान सीरियल भी रोजगार पैदा करेंगे और उन्हें रोकने को प्रतिबद्ध इश्तिहार भी रोजगार पैदा करेंगे. सरकारें ऐसे रोजगार पैदा करने में एक्सपर्ट होती हैं.
शराब से कितनी आय बढ़ानी है, यह टारगेट तय करके उन्हें हासिल करने में बहुतों को रोजगार मिलता है, फिर शराबबंदी के इश्तिहार तैयार करने में बहुतों को रोजगार मिल जाता है. सरकार शराब से कमाती है, फिर उससे हासिल रकम का एक हिस्सा शराबबंदी के इश्तिहारों में खर्च करके डरती भी है कि कहीं इन इश्तिहारों का असर सच में ही ना हो जाये.
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