[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home Opinion चुनावी तरकश के तीर तैयार

चुनावी तरकश के तीर तैयार

0
नवीन जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
साल 2019 के चुनावी संग्राम का मैदान सज रहा है. कुछ सेनाएं काफी पहले से तैयार हैं, कुछ अंतिम तैयारियों की हड़बड़ी में हैं और कुछ अब भी ठीक से तय नहीं कर सकी हैं कि किस शिविर का रुख करना है. जो संग्राम के अंतिम दिन तक अदले-बदले और पैने किये जाते रहेंगे, वह हैं इस युद्ध में इस्तेमाल होनेवाले हथियार. जनता को प्रभावित करने, एक-दूसरे के व्यूह को भेदने और रणनीतियां विफल करने में इन जुबानी तीरों की बड़ी भूमिका होती है.
रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में जिन दो बड़े और बहु-प्रचारित कार्यक्रमों में हिस्सा लिया, उनसे भाजपा के चुनावी तरकश के मुख्य तीरों का स्पष्ट संकेत मिलता है. पहला कार्यक्रम था किसान सम्मान निधि योजना की शुरुआत. देश के एक करोड़ से ज्यादा किसानों के बैंक खातों में पहली किस्त के दो-दो हजार रुपये जमा कराये गये. एक साल में हर किसान के खाते में छह हजार रुपये जमा करने की योजना है.
दूसरा कार्यक्रम कुंभ नगरी, प्रयागराज में संगम-स्नान करना था. यह सामान्य कुंभ स्नान नहीं था, बल्कि चुनाव मैदान की ओर अग्रसर आस्थावान प्रधानमंत्री की ऐसी संगम-डुबकी थी, जो व्यापक हिंदू समाज को विशेष चुनावी संदेश देने के लिए लगायी गयी है. मोदी जी ने इस अवसर का भावुक इस्तेमाल किया. उन्होंने कुंभ के स्वच्छ आयोजन का श्रेय सफाई कर्मचारियों को देते हुए उनके पांव पखारे. सफाईकर्मियों के पैर धोने की यह सेवा व्यापक दलित समाज के लिए महत्वपूर्ण संदेश देना है.
आसन्न संग्राम के तीन हथियार तो ये निश्चित ही होने हैं. मोदी सरकार को लगता है कि देशभर के किसानों की नाराजगी उस पर भारी पड़ रही है. हाल के तीन राज्यों में उसकी पराजय में किसानों के गुस्से का बड़ा हाथ रहा. गोसंरक्षण के हिंदू एजेंडे के तहत बंद बूचड़खानों के कारण बड़ी संख्या में छुट्टा जानवरों के फसलें चौपट करने से उत्तर भारत के राज्यों के किसान और भी हैरान-परेशान हुए हैं.
बड़े पैमाने पर किसान-ऋण माफी, किसानों की आय दोगुनी करने की घोषणाएं और गो-संरक्षण शालाएं बनाने की कवायद नाकाफी लग रही हैं. किसानों के इस गुस्से को भुनाने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पूरा जोर लगाये हुए हैं. उन्होंने और भी बड़े स्तर पर ऋण माफ करने के वादे किये हैं. किसानों को खुश करने की कोशिश पक्ष-विपक्ष दोनों की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल होना स्वाभाविक है.
दूसरा बड़ा चुनावी शस्त्र हिंदूवादी राजनीति है. भाजपा का यह हमेशा ही प्रमुख हथियार रहा है, लेकिन इधर राहुल गांधी ने भी कांग्रेस को हिंदू चोला पहनाया है.
वे मंदिरों में पूजा-पाठ कर रहे हैं, माथे पर तिलक-चंदन छापकर केदारनाथ की यात्रा कर आये और जनेऊ धारण कर कर्मकांड करते भी खूब दिख रहे हैं. कांग्रेस की नयी रणनीति उन उदार हिंदुओं को मनाना है, जो ‘अल्पसंख्यक-तुष्टीकरण’ के आरोपों के प्रभाव में उग्र हिंदू बनकर भाजपा के पाले में चले गये हैं. साथ ही, यह भाजपा पर उसी के हथियार से हमला करने की रणनीति भी है. लिहाजा भाजपा को अपना भगवा रंग और गाढ़ा करना है. अर्धकुंभ को ‘कुंभ’ प्रचारित कर, उस पर अरबों रुपये व्यय करके और दुनियाभर में उसके भव्य और स्वच्छ आयोजन के प्रचार से भाजपा यही कोशिश कर रही है.
उग्र हिंदूवादी राजनीति के साथ दलित-पिछड़ा हितैषी चेहरा प्रस्तुत करके भाजपा ने 2014 और उसके बाद कई चुनाव जीते. तबसे ही दलित-पिछड़ा उसकी प्राथमिकता में रहे, लेकिन हाल के महीनों में इस राजनीति ने करवट बदलनी शुरू की है.
विशेष रूप से 80 सीटों वाले उत्तर-प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन ने उसकी नींद उड़ा रखी है. इसलिए इस चुनावी संग्राम में दलित-पिछड़ा तीर खूब चलने हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने कुंभ स्नान के बाद सफाई कर्मियों के पैर धोकर अपने तूणीर में एक और तीर जमा कर लिया है. विपक्ष इसी तीर से मोदी सरकार को दलित-विरोधी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा.
बड़े पैमाने पर राष्ट्रवाद और देशभक्ति का ज्वार इस चुनाव में उठाया जाना है. उरी में हुए आतंकी हमले के बाद सितंबर, 2016 में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सीमा में घुसकर जो सर्जिकल स्ट्राइक की थी, देश-रक्षा के उस ‘अत्यंत साहसी’ अभियान की चर्चा को भाजपा ने अब तक इसलिए शांत नहीं होने दिया था.
इधर पुलवामा में हुए सबसे बड़े आतंकी हमले के बाद देश के गुस्से को राष्ट्रवाद और देशभक्ति की भावनाओं से जोड़ा जा रहा है. भाजपा के पास यह उस ब्रह्मास्त्र की तरह है, जिसकी काट विपक्षी दल नहीं कर सकते. देश की सुरक्षा के मुद्दे पर चुनावी राजनीति आत्मघाती होगी. स्वाभाविक है कि भाजपा इसका इस्तेमाल सोच-समझकर ही करेगी.
कोई आश्चर्य नहीं कि मोदी सरकार की उपलब्धियों के तीर इस चुनावी संग्राम में प्राथमिकता में नहीं रहेंगे. सरकार तो बहुत उपलब्धियां गिनाती है, लेकिन शायद उन्हें चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त नहीं समझती.
दूसरा खतरा यह है कि विपक्ष के पास इन तीरों की अच्छी काट मौजूद है. साल 2014 के चुनाव-प्रचार में भाजपा और मोदी जी के बड़े-बड़े वादे विपक्ष क्यों भूलेगा. जब-जब भाजपा उपलब्धियों का शंख-घोष करेगी, विपक्षी महारथी उसके वादों का हिसाब पूछकर जोरदार पलटवार करेंगे.
यूपीए सरकार में भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामले 2014 में भाजपा के पास हथियार के रूप में थे. विपक्ष, विशेष रूप से कांग्रेस ने इस बार राफेल विमान सौदे को मोदी सरकार के विरुद्ध भ्रष्टाचार का बड़ा मुद्दा बनाया है.
राहुल इसे लेकर मोदी पर सीधा हमला कर रहे हैं. चुनाव प्रचार में वे इसे और तीखा करेंगे. हालांकि भाजपा को सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय का कवच मिल गया है. तय है कि राफेल से लेकर बोफोर्स, 2जी, कोयला खान, चारा घोटाला जैसे प्रकरणों के वार-प्रत्यावार खूब होंगे.
भाजपा राष्ट्रवाद और उग्र हिंदुत्व तो विपक्ष कृषि व किसानों की दुर्दशा, बेरोजगारी, सांप्रदायिकता और संवैधानिक संस्थाओं पर हमले के तीर चलायेंगे. चुनावी शंखनाद होते ही आरोप-प्रत्यारोपों का जो सिलसिला शुरू होगा, उसमें सच-झूठ सब गड्ड-मड्ड हो जायेगा. झूठ को सच और सच को झूठ साबित करने की कोशिश होगी. जनता के लिए ही नहीं, अनेक बार मीडिया के लिए भी यह तय करना कठिन हो जायेगा कि आरोपों का धुआं किसी चिंगारी से उठ रहा है या धुआं भी धोखा ही है.चुनाव प्रचार व्यक्तिगत और मर्यादा विहीन होता चला आ रहा है. इस बार नैतिकता और भी पददलित होगी.
ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel