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राष्ट्रीय संपत्ति की रक्षा

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किसी घटना पर रोष जताने के लिए सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की परिपाटी चिंताजनक होती जा रही है. शनिवार रात को उत्तर प्रदेश में वाराणसी से दिल्ली आ रही वंदे भारत एक्सप्रेस पर नाराज भीड़ ने पत्थरबाजी कर चालक केबिन और छह डिब्बों के शीशों को क्षतिग्रस्त कर दिया. प्रदर्शनों और हड़ताल के दौरान सरकारी बसों, दफ्तरों और अन्य चीजों को आगजनी और तोड़-फोड़ का निशाना बनाना रोजमर्रा की बात हो गयी है.

बीते दिनों अरुणाचल प्रदेश में बड़े पैमाने पर हुई हिंसा में उप मुख्यमंत्री के घर को आग लगा दी गयी और मुख्यमंंत्री के आवास पर हमला करने की कोशिश की गयी. इसी माह केरल उच्च न्यायालय ने एक राजनीतिक संगठन को बंद के दौरान हुई क्षति की भरपाई करने का आदेश दिया है. ऐसी अनेक घटनाएं हैं. साल 2007 में सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक संपत्ति को बचाने के 1984 के कानून में जरूरी बदलाव करने के इरादे से एक समिति का गठन किया था. इसकी सिफारिशों को 2015 के संशोधन विधेयक में गृह मंत्रालय ने जोड़ा भी था.

फरवरी, 2016 और नवंबर, 2017 में संबंधित मामलों पर सुनवाई करते हुए दोषियों को सजा के साथ क्षतिपूर्ति के लिए आर्थिक दंड पर भी जोर दिया था. पंजाब एवं पिछले साल अक्तूबर में देश की सबसे बड़ी अदालत ने उग्र और हिंसक प्रदर्शनों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर नुकसान के आकलन और भरपाई सुनिश्चित करने के लिए हर जिले में एक विशेष न्यायिक अधिकारी की नियुक्ति की बात कही थी. ऐसा उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय पर से इस तरह के मामलों के निपटारे के दबाव को कम करना था.
दो साल पहले पंचकूला में डेरा सच्चा सौदा के मुखिया राम रहीम के समर्थकों के उत्पात का स्वतः संज्ञान लेते हुए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने डेरा की संपत्ति को जब्त कर उससे नुकसान भरने का आदेश दिया था. वर्ष 2012 में आजाद मैदान में हुई तोड़-फोड़ पर फैसला देते हुए पिछले साल मार्च में बंबई उच्च न्यायालय ने फिर दोहराया था कि हंगामा करनेवाले और आंदोलन के आयोजकों से नष्ट हुई सार्वजनिक संपत्ति का हर्जाना वसूला जाना चाहिए.
इस मसले पर विचार करते हुए यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि राष्ट्रीय संपत्ति को नष्ट करने का मसला सिर्फ अदालती फैसले और प्रशासनिक कार्रवाई से हल नहीं किया जा सकता है. हम सभी में यह भावना होनी चाहिए कि देश की साझी संपत्ति और संसाधन में सबकी हिस्सेदारी है तथा इनकी रक्षा में भी हमारी भागीदारी होनी चाहिए. शानदार सुविधाओं से युक्त नयी ट्रेनों- तेजस, महामना, पंचवटी आदि- से चीजें चुराने और तोड़ने की घटनाएं हिंसक प्रदर्शनकारियों की मानसिकता का ही एक रूप है.
सार्वजनिक संपत्ति और सुविधाओं की रक्षा के साथ हमें उत्पात करनेवालों को रोकना-टोकना भी चाहिए. नुकसान को रोकने के लिए कानूनी प्रावधानों को सख्ती से लागू करने के साथ व्यापक जन-जागरूकता के लिए भी प्रयासरत होना जरूरी है.

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