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राष्ट्र निर्माण के नायक

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शफक महजबीन
टिप्पणीकार
mahjabeenshafaq@gmail.com
भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद की आज पुण्यतिथि है. राजनीति में कदम रखने के पहले से ही वे एक अजीम शख्सियत थे. वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, एक कवि थे, लेखक और पत्रकार भी थे. इनका जन्म 11 नवंबर, 1888 को मक्का में हुआ था.
बंगाल में इनके पिता मौलाना मोहम्मद खैरुद्दीन से इन्हें शुरुआती शिक्षा मिली, लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए एक शिक्षक रखा गया, जिससे इन्होंने अरबी और फारसी सीखी. बाद में इन्होंने दर्शनशास्त्र, ज्यामिति और गणित भी सीखी. मौलाना आजाद को पढ़ने का बहुत शौक था, इसलिए अंग्रेजी, इतिहास और राजनीतिशास्त्र जैसे विषयों को इन्होंने खुद से ही पढ़ा.
महात्मा गांधी को ‘ज्ञान का सम्राट’ कहनेवाले मौलाना आजाद उनके सिद्धांतों को बहुत मानते थे. उन्होंने गांधीजी के साथ ‘सविनय अवज्ञा’ और ‘असहयोग आंदोलन’ में हिस्सा लिया था. वे न सिर्फ देश के विभाजन के सख्त खिलाफ थे, बल्कि नस्ली भेदभाव के भी खिलाफ थे. उनके लिए राष्ट्र ही सब कुछ था.
उनके बारे में गांधीजी लिखते हैं- ‘इस्लाम के बारे में जितना ज्ञान मौलाना आजाद को है, उससे अधिक किसी को भी नहीं होगा. उनकी जितनी दृढ़ श्रद्धा इस्लाम में है, उतनी ही दृढ़ श्रद्धा राष्ट्रवादिता में भी है.’ जवाहरलाल नेहरू ने भी अपनी किताब ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में उनके बारे में लिखा है- ‘भारत में राष्ट्रवाद के बारे में छिड़ी बहसों को देखते हुए मौलाना आजाद की शख्सियत के बारे में पढ़ने-पढ़ाने की जरूरत है.’
मौलाना आजाद हिंदू-मुस्लिम एकता पर बहुत जोर देते थे. महज बारह-तेरह साल की उम्र में ‘अल-मिस्वाह’ पत्रिका के संपादक बने. साल 1912 में ‘अल-हिलाल’ नामक पत्रिका निकाली, जो युवाओं को एकजुट होकर आजादी के लिए कदम उठाने को प्रेरित करती थी. ब्रिटिश सरकार ने इस पर पाबंदी लगा दी, तो फिर उन्होंने ‘अल-बलाग’ नाम से दूसरी पत्रिका शुरू कर दी.
साल 1952 में रामपुर से सांसद चुने जाने के बाद वे भारत के शिक्षा मंत्री बनाये गये. शिक्षा मंत्री रहते हुए 22 फरवरी, 1958 को वे इस दुनिया को अलविदा कह गये. मौलाना आजाद ने 14 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए शिक्षा को अनिवार्य किया था और गरीबों एवं महिलाओं की शिक्षा पर ज्यादा जोर दिया था. सच्चे अर्थों में वे राष्ट्र निर्माण के बड़े नायक थे.
मौलाना आजाद देश की तरक्की के लिए शिक्षा को बहुत जरूरी मानते थे. उन्होंने देशभर में कई विश्वविद्यालय और शैक्षणिक संस्थान खुलवाये, ताकि युवाओं को बेहतर शिक्षा मिल सके. उन्होंने ‘विवि अनुदान आयोग’ (यूजीसी), आइआइटी और आइआइएम जैसे संस्थानों की नींव रखी.
भारत आज शिक्षा के क्षेत्र में जितना आगे है, इसमें उनका बड़ा योगदान है. साल 1957 में उनकी किताब ‘इंडिया विन्स फ्रीडम’ आयी, जो स्वतंत्रता आंदोलन पर थी. साल 1992 में उन्हें ‘भारत रत्न’ सम्मान से नवाजा गया. उनके जन्मदिन को ‘राष्ट्रीय शिक्षा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है.
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