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एमबीएस का दौरा

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सऊदी अरब के शहजादे मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) का भारत, पाकिस्तान और चीन का दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब पाकिस्तान-समर्थित गिरोह लगातार आतंकी हमलों को अंजाम दे रहे हैं.
बुधवार को ईरानी सुरक्षाबलों और गुरुवार को भारतीय सुरक्षाबलों के काफिले पर आत्मघाती हमले के जिम्मेदार गिरोह और उनके सरगना बरसों से पाकिस्तान में पनाह लिये हुए हैं. इन हमलों पर हमेशा की तरह पाकिस्तान का रवैया टालमटोल का है. अफगानिस्तान ने भी संयुक्त राष्ट्र में शिकायत की है कि उसकी संप्रभुता की अवहेलना करते हुए इमरान खान सरकार तालिबानियों से बातचीत कर रही है. सऊदी अरब और पाकिस्तान के गहरे संबंध हैं. भयानक आर्थिक संकट से पाकिस्तान को निकालने में सऊदी अरब बड़ी मदद भी कर रहा है.
हालांकि, भारत के साथ भी सऊदी अरब समेत सभी अरब देशों के रिश्ते मजबूत हैं, पर 2006 में बादशाह अब्दुल्लाह की भारत यात्रा के बाद बेहतरी का नया दौर शुरू हुआ. किसी सऊदी शासक का पांच दशकों बाद भारत आगमन हुआ था. वर्ष 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब जा चुके हैं.
मध्य-पूर्व में शांति, पेट्रोलियम कारोबार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ाने के साथ आतंकवाद पर दोनों देशों की राय एक-जैसी है. लेकिन, सऊदी अरब को पाकिस्तान पर दबाव बनाने में कामयाबी नहीं मिली कि वह भारत के खिलाफ आतंक की अपनी आधिकारिक नीति का त्याग कर दे.
शहजादा सलमान के दौरे में भारत को मजबूती से यह मुद्दा उठाना चाहिए. भारत से उन्हें चीन जाना है. चीन ने सुरक्षा परिषद् में आतंकी सरगना मसूद अजहर पर पाबंदी लगाने के प्रस्तावों को दो बार अपने विशेषाधिकार से रोका है.
भारत की तरफ से यह कूटनीतिक कोशिश की जानी चाहिए कि सऊदी शहजादा चीनी नेतृत्व के सामने भारत की चिंताओं को रखें. चाहे वह चाबहार और ग्वादर बंदरगाहों से अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य को विस्तार देने का एजेंडा हो या अफगानिस्तान और कश्मीर में शांति और स्थिरता स्थापित करने के प्रयास हों, ये काम बिना पाकिस्तान-समर्थित आतंकवाद पर लगाम लगाये संभव नहीं हैं.
भारत ने अपने कूटनीतिक और वाणिज्यिक संतुलन से सऊदी अरब के साथ उसके परंपरागत प्रतिद्वंद्वी ईरान से भी द्विपक्षीय संबंध बेहतर किये हैं. पाकिस्तान और आतंकवाद पर चीन के नकारात्मक रुख के बावजूद उसके साथ सहयोग की नीति हमने अपनायी है, चाहे वह आपसी व्यापार का मसला हो या फिर अफगानिस्तान के पुननिर्माण के वैश्विक प्रयासों में भागीदारी हो.
अब सवाल है कि अपने पड़ोसी देशों- भारत, ईरान और अफगानिस्तान- को नुकसान पहुंचाने के पाकिस्तानी रवैये में बदलाव क्यों नहीं आता, और उसे मदद देनेवाले सऊदी अरब और चीन जैसे प्रभावशाली देश समुचित पहल क्यों नहीं कर रहे हैं? दक्षिण एशिया में अमन-चैन के बिना न तो इस इलाके का विकास मुमकिन है, न ही एशिया का.
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