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Home Opinion ‘कहां तुम चले गये!’

‘कहां तुम चले गये!’

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शफक महजबीन
टिप्पणीकार
mahjabeenshafaq@gma.l.com
एक से बढ़कर एक गजलों और गीतों को नर्म लहजे वाले अंदाज में अपने होठों से छूकर अमर कर देनेवाले और अपनी शहद जैसी आवाज से जग को जीत लेनेवाले गायक जगजीत सिंह जी अगर इस दुनिया में होते, तो आज वे अपना 78वां जन्मदिन मना रहे होते. आज भी उनकी मखमली आवाज का जादू लाखों दिलों को बहुत सुकून देता है.
जगजीत सिंह का जन्म आठ फरवरी, 1941 को श्रीगंगानगर, राजस्थान (तब बीकानेर स्टेट) में हुआ था. हालांकि, मूलतः उनका परिवार पंजाब के रूपनगर जिले (पुराना नाम रोपड़) का रहनेवाला था. उनके बचपन का नाम जगमोहन सिंह था, जिसे बाद में उन्होंने जगजीत सिंह कर लिया. उन्होंने जिंदगी में बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखे.
जगजीत सिंह के पिता इन्हें इंजीनियर बनाना चाहते थे, लेकिन इनकी रुचि संगीत में थी. साल 1965 में जब वे संगीत को अपना करियर बनाने के लिए मुंबई गये, तब वहां उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा और होटलों तक में गाना पड़ा. गजल गायक के रूप में स्थापित होने के बाद उन्हें सबसे बड़ा सदमा तब लगा, जब इनका अठारह साल का बेटा एक हादसे में चल बसा. एक कार्यक्रम में जब वे गजल- ‘दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह’ गा रहे थे, तो गाते-गाते रोये जा रहे थे.
कहते हैं कि दिल से जुड़े अपनों के साथ कुछ बुरा होनेकी आहट हमें महसूस हो ही जाती है. जैसे ही कार्यक्रम खत्म हुआ, उनके बेटे की मौत की खबर मिली. फिर तो वे पूरी तरह टूट गये.
जगजीत सिंह की गायकी का अंदाज बिल्कुल अलग था- नर्म, मुलायम, शहद जैसा मीठा, इसलिए लोगों के दिलों में उतरने में इन्हें कोई ज्यादा वक्त नहीं लगा. गजल पेश करने के इनके अंदाज ने गजल को उन आम लोगों तक पहुंचाया, जिन्हें गजलों की समझ कम थी.
उन्होंने आसान लफ्जों वाली गजलों को सादगी भरी और सीधा दिल में उतर जानेवाली आवाज देकर अमर कर दिया. एक बार उन्होंने कहा भी था कि ‘कलाम सिंपल होना चाहिए, जिससे सुननेवाला आसानी से समझ सके और सुनकर उसे आराम मिले.’जगजीत सिंह ने गीतकार और शायर निदा फाजली की ज्यादातर गजलें गायी हैं.
फिल्म ‘सरफरोश’ की गजल ‘होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है’ से लेकर फिल्म ‘तुम बिन’ की गजल ‘कोई फरियाद तेरे दिल में छुपी हो जैसे’ तक एक लंबा सिलसिला है. निदा के लफ्ज और जगजीत की आवाज, इस संगीतमय जोड़ी की पूरी दुनिया कायल है. निदा फाजली कहते थे, ‘जगजीत की आवाज से मेरी गजलों का रिश्ता तब से है, जब मिर्जा गालिब जवान हुआ करते थे.’
पद्मभूषण जगजीत सिंह की मखमली आवाज वाद्यों की स्वरलहरियों के साथ घुलकर श्रोताओं के कानों में मिसरी घोल देती है. ब्रेम हेमरेज के चलते अस्पताल में इन्होंने अपनी आखिरी सांस 10 अक्तूबर, 2011 को ली. गजल प्रेमियों के दिलों में इन्हें लेकर यह सवाल हमेशा रहेगा- ‘चिट्ठी न कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश, जहां तुम चले गये!’
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