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व्यापार पर रार

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों के कारण बीते दो सालों में वैश्विक वाणिज्य एवं व्यापार में बड़े उथल-पुथल हुए हैं.साल 2019 के अंतरराष्ट्रीय कारोबार पर भी इस असर के बने रहने की आशंकाएं जतायी जा रही हैं. अमेरिकी कांग्रेस के एक अध्ययन में बताया गया है कि भारत ने यदि अमेरिकी उत्पादों के आयात पर शुल्क बढ़ाया, तो अमेरिकी निर्यात को 900 मिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है.

भारत ने पिछले साल बादाम, काबुली चना, सेब, अखरोट, दाल आदि अनेक आयातित चीजों पर शुल्क बढ़ाने की घोषणा की थी. ट्रंप द्वारा पिछले साल मार्च में स्टील और अल्मुनियम के आयात पर शुल्क में भारी बढ़ोतरी के जवाब में यह घोषणा की गयी थी. अक्तूबर में तो उन्होंने भारत को ‘शुल्क सम्राट’ की संज्ञा ही दे दी थी. भारत जैसी घोषणाएं अन्य देशों ने भी की थीं, पर भारत ने अभी तक अपने इरादे को अमलीजामा नहीं पहनाया है.

भले ही राष्ट्रपति ट्रंप की नजर में मौजूदा भारतीय शुल्क बहुत अधिक हों, पर सच यह है कि प्रस्तावित बढ़ी हुई शुल्कें उन देशों की तुलना में कम हैं, जिनका अमेरिका के साथ बहुत व्यापार होता है. चीन ने 2017 में 20 बिलियन डॉलर मूल्य के 800 से अधिक अमेरिकी कृषि उत्पादों के आयात पर ज्यादा शुल्क लगाया था. कनाडा और मैक्सिको में यह आंकड़ा ढाई बिलियन डॉलर से अधिक है, तो यूरोपीय संघ का आयात एक बिलियन डॉलर का है. इन देशों ने इन आयातों पर बढ़ी शुल्कों की वसूली की है.

अमेरिकी नीतियों ने विभिन्न देशों के साथ व्यापार युद्ध का वातावरण बना दिया है. भारत ने अमेरिका के साथ बेहतर राजनीतिक, रणनीतिक और आर्थिक संबंधों का सम्मान करते हुए शुल्क की बढ़ी दरों को अभी तक लागू नहीं किया है, पर 31 जनवरी की समय-सीमा तय की गयी है.

अमेरिकी रवैये को देखते हुए इसे ज्यादा दिनों तक टालना भी मुश्किल है. ट्रंप प्रशासन की ओर से शुल्क, व्यापार असंतुलन और बौद्धिक संपदा अधिकार को लेकर भारत की आलोचना करते हुए अनेक बयान जारी होते रहे हैं.

अपनी व्यापार नीतियों की समीक्षा करना हर देश का अधिकार है और वह अपने आर्थिक हितों के अनुरूप उनमें बदलाव भी कर सकता है. लेकिन उन नीतियों के बरक्स दूसरे देशों को भी शुल्क दरों को घटाने-बढ़ाने का अधिकार है. पहले भी विभिन्न देशों के बीच व्यापारिक तनाव होते रहे हैं तथा ऐसे भी उदाहरण हैं, जब ये तनाव राजनीतिक और कूटनीतिक संकट में बदल गये.

आज जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों का सामना कर रही है, अमेरिका समेत अन्य महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं को बहुपक्षीय उत्पादन और बाजार की व्यवस्था के अनुरूप संतुलित समाधान का प्रयास करना चाहिए. भारत ने हमेशा ही संरक्षणवाद के मुकाबले देशों के बीच सहभागिता का समर्थन किया है, क्योंकि वैश्विक विकास और समृद्धि के लक्ष्य को अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ही हासिल किया जा सकता है.

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