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Home Opinion जो बीत गयी, सो बात गयी

जो बीत गयी, सो बात गयी

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अंशुमाली रस्तोगी

व्यंग्यकार

anshurstg@gmail.com

साल के अंत में जब पुराना साल विदा लेने को होता है और नया साल दस्तक देने को होता है, तब मैं हर साल देखता हूं कि हम सेंटी टाइप हो जाते हैं. भावनाओं को ऐसे निकालकर बाहर रख देते हैं कि बस पूछो ही मत. पुराने साल से सालभर किये ‘पापों’ की माफी मांगते हैं. नये साल पर कुछ ‘संकल्प’ लेते हैं. जबकि यह हर किसी को पता रहता है कि जिंदगी को चलना उसी ढर्रे पर है, पर क्या करें- दिल है कि मानता नहीं.

इस दिल का भी बड़ा लोचा है. दिल कभी कुछ तो कभी कुछ भी नहीं कहता. पर ख्याल इसका रखना ही पड़ता है. न रखेंगे, तो यह कभी भी बिदक लेगा. जबकि दुनिया-समाज में आधे से अधिक कांड इस दिल के कारण ही होते हैं. अब जब हर किस्म का बोझ दिल पर डाले रहेंगे, तो भला वह क्यों नहीं बैठेगा. आखिर दिल ही तो है.

सच कहता हूं, गुजरते या आते साल को कभी मैंने दिल से नहीं लगाया. जानेवाले का इस्तकबाल भी उतनी ही शिद्दत से किया, जितना कि आनेवाले का. साल का आना-जाना तो जिंदगीभर लगा ही रहेगा. फिर क्यों हम गुजरते और आते साल के प्रति इतना सेंटी हों? जो बीत गयी सो बात गयी.

ऐसे लोग भी मैंने खूब देखे हैं, जो अपने कांडों, अपने पापों का जिम्मा गुजरते साल पर डाल देते हैं. क्यों भई? जब कांड कर रहे थे, तब क्या साल से पूछा था? मतलब- पाप इंसान करे और अपराधी साल को यह कहते हुए बना डाले कि ‘बीता साल कुछ अच्छा नहीं रहा.’ अमां, वह अच्छा तो तुम्हारे आचरण की वजह से नहीं रहा. साल को क्यों दोष देना भई!

नये साल पर तरह-तरह के संकल्प लेनेवाले भी बड़े अजीब प्राणी होते हैं. दुनियाभर के संकल्प तो यों ले लेते हैं, मानो सब निभा ही डालेंगे. पर, एक तारीख या हफ्ता बीतते ही सारे संकल्प ‘चू चू का मुरब्बा साबित होते हैं. वही ‘ऊंची दुकान फीका पकवान’ वाली कहावत.

अब तो लोग सोशल मीडिया को छोड़ने का भी ‘अतिरिक्त संकल्प’ लेने लगे हैं! लेकिन, निगाहें फिर भी मोबाइल के नोटिफिकेशन पर ही टिकी रहती हैं. सोशल मीडिया की लत से इतना आसान नहीं है पिंड छुड़ा पाना. इसकी पैठ जितनी दिमाग में है, उतनी ही दिल में भी है.

जिन्हें जो छोड़ना या पकड़ना हो वे छोड़ें-पकड़ें, उनकी मर्जी. लेकिन मैं मेरे गुजरते और आते साल को अच्छा ही कहूंगा, मानूंगा. जो भी अच्छा या बुरा है, वह मेरा है, साल का नहीं. साल तो बस एक माध्यम भर है मेरे बीच. हां, संकल्प मैं लेता नहीं. क्योंकि मुझसे ये निभाये नहीं जाते. दिमाग और जिंदगी पर एक बोझ टाइप लगते हैं.

तमन्ना बस इतनी जरूर रहती है कि जैसे मैं पिछले साल बिगड़ा रहा, आनेवाले साल में भी ऐसा ही बिगड़ा रहूं, क्योंकि- मेरा मानना है- दुनिया को बिगड़कर ही समझा जा सकता है.,सुधरे रहकर तो शायद नहीं.

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