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हिंदी में पढ़ने की विवशता

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सन्नी कुमार

टिप्पणीकार

sunnyand65@gmail.com

अगले महीने फिर ‘विश्व पुस्तक मेला’ का आयोजन होना है. पिछले पुस्तक मेला की कुछ असहज यादें मस्तिष्क में घूमने लगी हैं. ये यादें पुस्तक मेले को लेकर नहीं, बल्कि हिंदी भाषा को लेकर थीं. मेले की चकाचौंध रोशनी में हिंदी का वह पहलू दिखा ही नहीं, जिसे सबसे अधिक प्रकाश की जरूरत थी. धड़ाधड़ हो रहे पुस्तकों के लोकार्पण और विमोचन, तिस पर ‘स्टार वक्ताओं’ की उपस्थिति ने कुछ बुनियादी सवालों को उठने नहीं दिया, जिसका पूछा जाना और उससे भी बढ़कर उसका जवाब तलाशना जरूरी है. मेले में हुए तमाम गोष्ठियों और वक्ताओं के भाषण में जो सवाल गायब था वह था- ‘साहित्य से इतर अन्य विधाओं में कितनी मौलिक पुस्तकें हिंदी में उपलब्ध हैं?’

पुस्तक मेले में हिंदी भाषा से संबंधित ज्यादातर प्रकाशन के स्टॉल पर या तो धुर हिंदी साहित्य की किताबें थीं या फिर कुछ अन्य विषय की अनूदित किताबें. अगर हम मान लें कि यहां लगभग सभी प्रमुख प्रकाशन मौजूद थे, तो क्या हमें हिंदी भाषा के लिए चिंतित नहीं होना चाहिए?

जिस सवाल पर सबसे अधिक चिंतित होना चाहिए था, उसी पर सब मौन थे. सिर्फ साहित्य के भरोसे ही भाषा आगे नहीं बढ़ सकती, खासकर उस युग में जहां भाषा की बहुआयामी मांग हो. समाजशास्त्र में एक प्रचलित अवधारणा है कि समय का परिवर्तन अनिवार्य है और जिसके लिए परिवर्तन जितना अनुकूल होगा, वह उतना ही स्थायी होगा. फिर हिंदी इस कसौटी पर कहां हैं?

एक भाषा तभी समृद्ध कही जा सकती है, जब उसमें अध्ययन स्रोतों की न केवल प्रचुरता हो, बल्कि विविधता भी हो. अर्थात यदि कोई भाषा साहित्यकार बना सकती हो, तो वह इतिहासकार, डॉक्टर या फिर इंजीनियर और प्रबंधक भी बना सके. आर्थिक उदारीकरण के बाद के युग में बाजार और अधिक शक्तिशाली होकर उभरा है, तब यह सवाल और भी गंभीरता से उठना चाहिए कि इस बाजार की मांग पूरी करने में हिंदी कितनी सक्षम है?यह बात सच है कि अध्ययन के लिए किसी एक भाषा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, किंतु सवाल है कि ‘आधार भाषा’ कुछ तो होनी चाहिए?

अगर किसी भाषा में मौलिक पुस्तकें ही ना हों, तो कोई क्योंकर उस भाषा को आधार भाषा बनायेगा? शोध कार्यों से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी तक यदि एक भाषा पर्याप्त सामग्री उपलब्ध न करा पाती हो, तो क्या सिर्फ भावुक वादों और कोरी भावनाओं के सहारे भाषा को बचाया जा सकता है? सच्चाई यह है कि आज हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषा में अध्ययन करना रुचि नहीं, बल्कि विवशता है.

जो व्यक्ति आर्थिक रूप से इतना सक्षम है कि वह अपने बच्चों को महंगे निजी स्कूलों में पढ़ा सके, जहां अंग्रेजी में ही शिक्षा दी जाती है, वह ऐसा कर रहे हैं. भारतीय भाषाओं में पढ़नेवाले ‘शेष’ लोग हैं, जो किसी महंगे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने ‘लायक’ नहीं थे. अगर हम सच्चे भाषाप्रेमी हैं, तो हमें इस सवाल से जूझना ही होगा, ताकि ‘हिंदी में पढ़ना’ विवशता न हो.

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