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बेकाबू हत्यारी भीड़

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बुलंदशहर में उग्र भीड़ द्वारा पुलिस अधिकारी की हत्या से एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि आखिर ऐसे बेलगाम उन्माद को कैसे नियंत्रित किया जाये. देश के विभिन्न हिस्सों में कथित गोकशी और तस्करी के शक में दंगा-फसाद और पीट-पीटकर मार डालने की घटनाएं पिछले कुछ सालों से बदस्तूर जारी हैं.

सुबोध कुमार सिंह भी हत्यारी भीड़ के हाथों मारे गये पहले पुलिसकर्मी नहीं हैं. मथुरा में 2016 में पुलिस अधीक्षक मुकुल द्विवेदी और एक अन्य अधिकारी की भीड़ ने हत्या कर दी थी. पिछले साल सहारनपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के आवास पर हिंसक भीड़ ने हमला किया था.

ऐसी घटनाओं को किसी तात्कालिक आक्रामकता या हाशिये के अतिवादी समूहों की कारस्तानी मानना वास्तविकता से मुंह फेरना ही है. विभिन्न घटनाओं से जो जानकारियां सामने आयी हैं, वह इंगित करती हैं कि गौरक्षा के नाम पर उपद्रव कर रहे गिरोहों को राजनीतिक और सामाजिक संरक्षण प्राप्त है. इस कारण पुलिस को भी इनके विरुद्ध कार्रवाई करने में परेशानी होती है. जांच में कोताही या दबाव तथा अदालती देरी से भी इन हत्यारों को शह मिलती है.

शासन-प्रशासन में बड़े पदों पर आसीन अनेक लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आरोपितों के पक्ष में खड़े हुए हैं. गाय के नाम पर सांप्रदायिक विषवमन और धार्मिक आधार पर घृणा की राजनीति ने समाज को छिन्न-भिन्न कर दिया है. मृतक अधिकारी के बेटे ने सही ही कहा है कि उसके पिता की हत्या का कारण हिंदू-मुस्लिम के आधार पर हो रही राजनीति है.

भरोसे की कमी का आलम यह है कि अफवाहों के आधार पर हत्याओं का सिलसिला आम हो चला है. झूठ और फरेब के सहारे जो माहौल बनाया गया है, उसके खिलाफ समाज में भी कोई आत्ममंथन नहीं हो रहा है. इस प्रकरण में जहां स्वार्थी राजनीति दोषी है, वहीं मीडिया का बड़ा हिस्सा भी अपनी भूमिका निभाने में असफल रहा है. खबरिया चैनलों की रोजाना चर्चाओं से नफरत बढ़ती ही जा रही है.

अखबार भी ठीक से खबरें और विश्लेषण देने में कोताही बरत रहे हैं. लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति और मीडिया की जिम्मेदारी यह भी है कि वे समाज को सही दिशा में ले जाने की प्रक्रिया की अगुआई करें. समाज के बड़े-बुजुर्गों को भी अपने परिवार और पड़ोस के गुमराह युवाओं को उचित-अनुचित का एहसास कराना चाहिए. आज देश के सामने एक नैतिक संकट है, जहां कानून का पालन करना तो दूर, उसे तोड़ने का रिवाज चल पड़ा है. सार्वजनिक बतकही, राजनीतिक बहस और सोशल मीडिया में भाषा की मर्यादा समाप्त हो चुकी है.

आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श भी पहचान के विभिन्न खांचों में बंटकर तितर-बितर हो चुका है. ऐसे वातावरण में अर्थव्यवस्था की बढ़ोतरी और सुखी-समृद्ध जीवन की आस भी अधिक देर तक टिकी नहीं रह सकती. इस आस को बनाये रखने के लिए व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में संविधान के मूल्यों तथा शांति और सद्भाव के आचरण को आत्मसात करना होगा.

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