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Home Opinion चुनावी पूर्वसंध्या का भारत

चुनावी पूर्वसंध्या का भारत

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मृणाल पाण्डे
ग्रुप सीनियर एडिटोरियल
एडवाइजर, नेशनल हेराल्ड
mrinal.pande@gmail.com
फ्रांसीसी कहावत है, चीजें जितनी बदलती हैं, उतनी ही बिल्कुल पहले जैसी होती जाती हैं. भाजपा ईमान से कहें तो काफी हद तक 1971 की प्रभुसत्तावान कांग्रेस जैसी, और कांग्रेस, उसी काल की भाजपा सरीखी नजर आती है.
आज भाजपा के पास संसद के दोनों सदनों में पर्याप्त ताकत है. लेकिन फिर भी कांग्रेस से कहीं आगे जा कर वह तमाम भाषायी मर्यादाएं ताक पर रख रही है. इसके बाद भी वह संतुष्ट और आश्वस्त नजर नहीं आती. लिहाजा सारी राजकीय मशीनरी की मदद से विपक्षी नेतृत्व को हिलाकर, सीबीआइ से लेकर रिजर्व बैंक तक हर कहीं केंद्र की जकड़बंदी और भी सख्त बनाने, हर तरह के वैचारिक केंद्रों को अपने रंग में रंगने या दमित करने के लिए उतावली दिखती है. सरकार के तमाम बड़े नेता चौराहे पर खड़े होकर खुद को हर किसी से बेहतर और विपक्ष को हर तरह से नाकारा बताने की उत्कंठा दिखा रहे हैं.
उपरोक्त बात का ताजा उदाहरण है, नोटबंदी को न सिर्फ सही ठहराना बल्कि यह कहना कि बेटे की मौत से दुखी किसी बूढ़े बाप की तरह देश भी जल्द ही उसकी अप्रिय यादों से मुक्त हो जायेगा. इसके अलावा, कांग्रेस के लंबे समय तक कोषाध्यक्ष तथा दल प्रधान रहे स्व सीताराम केसरी के पदत्याग को एक दलित का जानबूझ कर किया अपमान बताया गया.
कांग्रेस ने यह बताने में देर नहीं की कि केसरी जी दलित नहीं वणिक समाज से आते थे और साथ ही यह याद दिलाना से न चूकी कि जब उन्होंने कोयंबटूर की जनसभा में अाडवाणी जी की उपस्थिति में हुए बम धमाके को आरएसएस की कारस्तानी बताया था, तो आज उनके कथित अपमान पर जनसभा में पछाड़ें खा रहे संघी नेताओं की संस्था ने उन पर मानहानि का वह मुकदमा दर्ज कराने में देर नहीं की, जिसे वर्ष 1998 में जिला अदालत ने बर्खास्त कर दिया .
आज शीर्ष पर बड़ी बिल्लियों के सनातन झगड़ों के बीच राज्यों की ताकत बढ़ गयी है. हर बड़े झगड़े का लाभ राज्यस्तर के कुछ नेताओं को हुआ है, जो क्षेत्रीय तौर से दमदार और एकछत्र होकर उभरे हैं. इसलिए साल 2019 के आम चुनावों में दोनों राष्ट्रीय दलों के लिये क्षेत्रीय दलों से चुनावी गठजोड़ के लिये चिरौरी करना इतनी जरूरी हो उठा है.
क्या यह विस्मयकारी नहीं कि भाजपा आज वर्ष 2014 के विपरीत राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ में सिर्फ मोदी जी के पोस्टरों पर निर्भर होने की बजाय लोकल नेतृत्व को महत्व दे रही है, जो एक साल पहले तक अकल्पनीय था. एकाधिक ताकतवर क्षेत्रीय दल अपने हित स्वार्थों को गिनकर अपने क्षेत्र के किसी अन्य बड़े जातीय क्षत्रप के साथ राज्यस्तर पर हाथ थामने का मन बना रहे हैं.
इसमें कोई शक नहीं कि मौजूदा शासन से जनता का मोहभंग हुआ है और उसके पुराने समर्थक भी उसके बढ़ते सत्ताई केंद्रीकरण तथा मौद्रिक वित्तीय नीतियों से तंग आ चुके हैं. कुछ साल पहले माना जाता था कि नयी अर्थव्यवस्था और पंचायती राज रंग लायेंगे, शहरी उद्योगों का विकास होगा, ग्राम समाज की अंधविश्वासी, प्रतिगामी सामाजिक परंपराएं टूटेंगी, महिलाएं तरक्की करेंगी और जड़ों तक प्रशासन में पैठ बनायेंगी.
इससे लिंग, जाति, क्षेत्र वगैरह के भेदभाव कम होंगे और नयी रोशनी आयेगी. लेकिन पिछले चार बरसों में हमने देखा है कि आर्थिक सोच व सामाजिक परंपराओं की जड़ें कितनी गहरी होती हैं और कई बार ऊपरी छंटाई के बाद बदलाव का भ्रम भले हो, चुनाव पास आये नहीं, कि माहौल फिर प्रतिगामी बना दिया जाता है.
लोग, खासकर युवा औरतें कहां जायें, कब जायें, किस तरह के कपड़े पहनें, किस यवन नामधारी शहर के नाम को किस तरह हिंदुत्व में रंगा जाये, गाय के बहाने किस तरह चमड़ा और मांस निर्यात से जुड़े दलित-अल्पसंख्य समुदाय को शारीरिक तौर से डराकर पीछे किया जाये, इस तरह की बातें पूरी गंभीरता से पहले कोई बड़ा नेता कहता है, फिर कुछ जत्थों की मार्फत शहर-शहर, गांव-गांव फैलायी जाती हैं.
कुल मिलाकर, वही मंदिर, मंडल, वही सरकारी खजाने खाली कराने और सरकारी बैंकों को दिवालिया करानेवाली सब्सीडियों के वादे, वही लैपटॉप, मिक्सी, टीवी और मुफ्त अनाज आदि का बेशर्म वितरण. ध्यान इस पर नहीं कि पर्यावरण प्रदूषण तथा उससे होनेवाले महारोग तेजी से बढ़ रहे हैं. अमीरों की अमीरी बढ़ रही है, जबकि बेरोजगारी कम होने के कोई आसार नहीं. सारा खेल यह है कि कैसे वोटों की खेती की जाए?
आजादी के बाद कुछ दशकों तक जो मुसलमान क्रांति-कामना रखता था, कम्युनिस्ट बन जाता था, लेकिन नाना थपेड़े खाकर अब वह भी राज्यवार भाव-ताव करने लगा है.
इच्छा यही है कि उसके नये नेता उसके लिये फौरी तौर से ही सही, जानमाल की सुरक्षा के लिये भाजपा को सत्ता से दूर रखने में मददगार साबित हों. इस माहौल में जिन शब्दों का पिछले सालों में सबसे ज्यादा अवमूल्यन हुआ है, धर्मनिरपेक्षता उनमें से एक है. धर्मनिरपेक्ष राजनीति जिन दलों ने शाब्दिक स्तर पर अंगीकार की भी हुई है, वह उनके राजकाज को कोई आंतरिक अनुशासन नहीं देती.
उधर धर्म की बातें करनेवाले भी कुछ स्वयंभू किस्म के साधु-साध्वियों की बातों को खंडित करने की बजाय, हर मंच पर उनकी मौजूदगी सुनिश्चित कर, संगीन आतंकी हमलों के चार्जशीटेड अपराधियों को नयी जांच बिठाकर मुक्त करवाकर, कभी योग और कभी (उप)भोग के रूपों को हिंदुत्ववादी भाषा से जोड़कर जाहिर कर रही है कि उसे सचमुच के धर्म की कितनी गहरी समझ है. धर्म और धर्मनिरपेक्षता, दोनों की सारी बुराइयां हमारे राजनैतिक दलों ने अंगीकार कर ली हैं, उनके असली मूल्य परे कर दिये हैं.
इसलिए, उत्तर से दक्षिण तक भारत में अराजकता लगातार बढ़ रही है. जिस समय उसे मिटाने की कोशिश में लगना था, उसे हम गोवध बंदी, मद्यनिषेध लागू करने, सड़कों के नाम बदलकर हिंदू राजाओं के नाम पर करने और छात्र अनुशासन के बहाने उच्च शिक्षा के गिने-चुने उत्तम संस्थानों को मटियामेट करने में गंवा रहे हैं.
इन दिनों सचमुच विचार करने लायक सवाल यह नहीं कि दो राष्ट्रीय दलों में से कौन दिल्ली का ताजो-तख्त संभालेगा? बल्कि यह है, कि जब आनेवाले समय में राष्ट्रीय दलों के लिए क्षेत्रीय दलों से समन्वय करना अपरिहार्य हो गया है, तब ऐसा जो भी गठजोड़ सत्ता में आयेगा, उससे क्षेत्रीय और राष्ट्रीय हितों का समन्वय किस तरह बनाया जा सकेगा?
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