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Home Opinion मरनेवाले की गलती है जी!

मरनेवाले की गलती है जी!

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संतोष उत्सुक, व्यंग्यकार

santoshutsuk@gmail.com

दुनिया की चौथी आर्थिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर धरती पर जीना और मरना विवादास्पद है. पिछले दिनों ‘आदमखोर’ बाघिन को मारने के लिए हवाई जहाज से इटालियन कुत्ते आये, हाथी बुलाये गये, बकरियों और घोड़ों को बांधकर मचान बनाये गये, जंगल में सौ से ज्यादा कैमरे लगाये गये. अभियान बावन दिन चला, तब अथक प्रयासों से बाघिन को मारा गया.

इस मामले में हम हद से ज्यादा परेशान करने और परेशान होकर मरनेवाली बाघिन की गलती निकाल सकते हैं कि उसने तेरह इंसानों का शिकार किया था. प्रकृति की गोद से वन्यजीव उजाड़ने में इंसान की गलती तो है ही नहीं, यह तो जानवरों की गलती है कि उन्होंने इस दुनिया में जन्म लिया! कहीं कोई भी मरे, कुदरत, भाग्य, वक्त या सिस्टम को दोष देना सुरक्षित तरीका है. इस देश में किसी भी कार्यक्रम के आयोजक भले ही गैर-जिम्मेदार हों, उनका सुरक्षा प्रबंध कमजोर हो, मगर आखिर में मरनेवालों की ही गलती बाहर आ जाती है.

इतिहास में दर्ज यमुना किनारे हुए अंतरराष्ट्रीय रिकाॅर्ड रचाऊ महोत्सव से निसंदेह लाखों लोग अब भी प्रेरणा ले रहे होंगे. इस आयोजन के कारण पहले से बेसुध यमुना व अड़ोस-पड़ोस मरने को हो गया था. साफ तौर पर वह गलती यमुना व अड़ोस-पड़ोस की थी कि वे वहां थे ही क्यों. वास्तव में हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी अभी तक उसी पुराने बांसुरी वाले के हवाले है.

क्या पर्वों का राजनीतिकरण ऐसी घटनाओं का उत्तरदायी है. ऐसा लगता नहीं, ठीक है नेता ऐसा करना चाहते हैं, पर यह तो जनता की जिम्मेदारी है कि उनके भुलावे में न आये. इस आधार पर भी मरनेवालों की गलती निकलेगी. सतर्क प्रशासन तो कितने दशक से बेचारा है. पुलिस कर्मचारी वैसे ही कम हैं, वे चोर-उच्चकों, नेताओं, मंत्रियों, वीआईपी व अफसरों को सलाम बजायें या आम जनता का ख्याल रखें.

यह झूठ नहीं है कि आम लोग चाहे वोटर, किसान, दर्शक या भक्त हों, ये सब साधारण नक्षत्रों में जन्मे होते हैं. कोई उनका जिम्मा उठाने को क्यों तैयार होगा? इसलिए चाहे वे पिस जायें, घिस जायें, कट जायें या मर जायें, सब उनकी अपनी ही गलती होती है.

कानूनजी को हमने फिल्म और वास्तविकता दोनों में आंखों पर पट्टी बांधे पाया है. अंधेरे में अंधे के लिए देखना मुश्किल है, इसलिए ऐसी स्थिति में कानूनजी की गलती मानना भी गलत है. देश से वीआईपी कल्चर लाल बत्तियों के साथ गुप्त हुए अरसा बीत चुका है. अब यह भी जनता की गुस्ताखी है कि वह कुछ लोगों को वीआईपी समझती है. कुछ अधर्मी लोग कहते हैं कि अब धर्म कम, दिखावा ज्यादा है.

समझदार लोग ठीक फरमाते हैं कि आम लोग हमेशा लापरवाह रहते हैं. किसी भी आयोजन में बिना सोचे-समझे हजारों की संख्या में जमा हो जाते हैं. कर्ज से लदी-दबी सरकारों को आम लोगों के मरने पर लाखों का मुआवजा भुगतना पड़ता है. मरनेवाले कुदरती तरीके से मरें, तो उनकी गलती नहीं मानी जायेगी.

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