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सर्वथा समर्थन के योग्य स्मारक

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पवन के वर्मा

लेखक एवं पूर्व प्रशासक

pavankvarma1953@gmail.com

भला सरदार पटेल की मूर्ति क्यों किसी विवाद की वजह बने? क्या इसलिए कि यह विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति है? अथवा इसलिए कि इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री द्वारा संयोजित एक अत्यंत भव्य समारोह था या कि जैसा बताया जा रहा है, इसमें लगभग तीन हजार करोड़ रुपयों की लागत आयी?

विवाद के कुछ अन्य कारण भी बताये गये हैं- मूर्तियां स्थापित करने का चलन पैसे की बर्बादी बन चुका है या कि-जैसा कुछ लोगों का विचार है- सरदार स्वयं अपने नाम पर किये जानेवाले इस तमाशे से अप्रसन्न हुए होते?

शायद कुछ लोगों का यह विचार भी हो कि सरदार ऐसे महिमामंडन के योग्य न थे या फिर कांग्रेस इसलिए भी चिढ़ी हो कि सरदार पटेल को नरेंद्र मोदी तथा भाजपा ने अपना लिया. और अंत में, कुछ लोग यह भी महसूस कर सकते हैं कि केवल नेहरू-गांधी परिवार ही इस तरह महिमामंडित किये जाने हेतु सबसे अधिक योग्य है.

इस मूर्ति के आलोचकों से मैं केवल यह कहना चाहता हूं कि आप उपर्युक्त में से किसी भी विकल्प का चयन कर लें. जहां तक मेरा संबंध है, तो मैं यह मानता हूं कि भारत के इस लौह पुरुष के एक उपयुक्त स्मारक की कमी बहुत दिनों से बनी हुई थी, सो यह मूर्ति यदि उनके गृहराज्य में खड़ी हुई और यह विश्व की उच्चतम मूर्ति है, तो वैसी ही सही.

एक लंबे वक्त से ऐसे सभी स्मारकों पर नेहरू-गांधी परिवार द्वारा एकाधिकार जैसा कर लिये जाने की प्रवृत्ति प्रदर्शित की गयी, जिसने देश के स्वतंत्रता आंदोलन तथा हालिया इतिहास के अन्य शलाका व्यक्तित्वों को अपेक्षतया हाशिये पर पहुंचा दिया. जब पंडित नेहरू की मृत्यु हुई, तो उनके आवास को ही संग्रहालय बना दिया गया. यह पहली अतिरंजना थी.

भारत के प्रधानमंत्री के लिए चिह्नित एक आवास को लंदन के 10 डाउनिंग स्ट्रीट की ही भांति भावी प्रधानमंत्रियों का आवास बने रहने दिया जाना चाहिए था. यह मेरा दृढ़ मत है कि भारत के प्रधानमंत्री के आवास हेतु तीन मूर्ति भवन से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती. स्थिति, आकार और प्रोटोकॉल के लिए इसकी उपयुक्तता के नजरिये से यह पूरी तरह इसके लायक है. पर इसकी जगह, अभी हमारे प्रधानमंत्री तीन बंगलों को अनगढ़ ढंग से जोड़कर बने एक कामचलाऊ आवास में रहते रहे हैं.

हममें अपने प्रधानमंत्रियों के सम्मान में संग्रहालयों के सृजन की जन्मजात प्रवृत्ति है. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का आवास भी एक संग्रहालय है. राजधानी का एयरपोर्ट उनके ही नाम से है. दिल्ली का एक अन्य भूचिह्न कनॉट प्लेस का नाम राजीव गांधी चौक है. राजधानी के प्रमुख कला प्रतिष्ठान पर इंदिरा गांधी का नाम चस्पा है. नयी दिल्ली के सबसे बड़े स्टेडियम का नामकरण जवाहरलाल नेहरू पर है. राजधानी में ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय भी है. देश का सबसे बड़ा खुला विश्वविद्यालय इंदिरा गांधी के नाम से सुशोभित है.

राजधानी के ही एकमात्र तारामंडल से नेहरू का नाम जुड़ा है, जबकि वहां का सबसे बड़ा कैंसर अस्पताल उनके नाती के नाम है. इसके अलावा, राजधानी में ही कई विशाल अमूल्य भूखंड नेहरू, इंदिरा और राजीव के समाधि स्थलों के नाम चिह्नित हैं.

ये सब तो देश की राजधानी में सीमित केवल कुछ उदाहरण हैं, पर वे यह स्पष्ट करने को काफी हैं कि इस मामले में अतिरंजना हुई है. चूंकि पिछले सात दशकों के ज्यादातर वक्त में नेहरू-गांधी परिवार ही सत्तासीन रहा, सो इसकी वजह समझना ज्यादा कठिन नहीं है. इसमें चापलूसों की भी अहम भूमिका रही होगी. एक पल के लिए भी मेरा इरादा देश के लिए नेहरू, इंदिरा और राजीव के योगदान को कोई कम कर दिखाने का हरगिज नहीं है.

उन्होंने देश की अत्यंत विशिष्ट सेवा की और उन्हें याद किया जाना जरूरी है. इंदिरा और राजीव ने देश के लिए अपना जीवन न्योछावर किया, जिसे कभी भूला नहीं जा सकता. खासकर नेहरू की तो मैं बहुत सराहना करता हूं.

लेकिन, यह बात मुझे इस तथ्य के प्रति अंधा नहीं बनाती कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम में कई अन्य शीर्षस्थ नेता भी थे, जिन्हें उनका देय नहीं मिला.

पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के शव के साथ तब की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी द्वारा किया गया तथाकथित ओछा बरताव इसकी एक मिसाल है. नेताजी सुभाषचंद्र बोस तथा बाद में लाल बहादुर शास्त्री को उनका उचित श्रेय नहीं मिल सका. डॉ राम मनोहर लोहिया जैसे अन्य महान नेता भी हाशिये पर ही रह गये. और सरदार पटेल की भी ऐसी ही अनदेखी हुई.

स्पष्ट है कि भाजपा इस त्रुटि के परिमार्जन की कोशिश कर रही है. भाजपा खेमे से आये दीनदयाल उपाध्याय जैसे कुछ नेता एकाएक प्रमुखता के दायरे में आ गये हैं, जिनके नाम पर मुगल सराय स्टेशन का जबान चढ़ा नाम बदल दिया गया है.

मगर भाजपा के पास स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रतिष्ठित नेताओं की कमी है. इसलिए उसे सरदार पटेल को अपनाने की आवश्यकता है. नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्ति को ‘लौह पुरुष’ का खिताब पसंद आता है. यह दूसरी बात है कि इस महिमामंडन में एक विडंबना भी निहित है.

भाजपा ने, जो मूलतः आरएसएस से जुड़ी है, संघ के बारे में सरदार के विचारों को वस्तुतः भुला दिया है, जो उसके अथक आलोचक थे. शायद भाजपा यह सोचती हो कि सरदार की मूर्ति का आकार उनकी विरासत के इस हिस्से को लोगों द्वारा भुला दिये जाने में सहायक होगा.

इन सबके बावजूद, भारत के इस लौह पुरुष के स्मारक को किसी विवाद की वजह नहीं बनने देना चाहिए. इस मूर्ति पर खर्च धनराशि कम हो सकती थी, पर यह शायद ही कोई ठोस वजह हो सकती है. अन्य महान नेताओं को, जिनमें अधिकतर नेहरू-गांधी परिवार से आते रहे हैं, याद करने में पहले भी हजारों करोड़ रुपये व्यय किये जाते रहे हैं.

स्वतंत्रता आंदोलन में सरदार पटेल का अकूत योगदान रहा है. भारत के एकीकरण में उन्होंने जिस इस्पाती दृढ़ता का प्रदर्शन किया- जिसने उन्हें ‘भारत का बिस्मार्क’ की उपाधि दिलायी- उसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा. वे एक सच्चे भारतीय थे, गहरी संवेदनशीलता तथा विवेक-संपन्न किसान नेता तथा आधुनिक अखिल भारतीय लोकसेवा प्रणाली के संस्थापक थे. भारतीय गणराज्य के एकीकर्ता के रूप में 31 अक्तूबर 2018 को उन्हें समर्पित एकता की मूर्ति (स्टैच्यू ऑफ यूनिटी) प्रत्येक देशप्रेमी भारतीय द्वारा समर्थन किये जाने योग्य है.

(अनुवाद: विजय नंदन)

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