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फसल पकने का कलरव

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मिथिलेश कु. राय

युवा रचनाकार

mithileshray82@gmail.com

दिन ढल चुका था और अंधेरा उतर रहा था. कक्का अपने खेतों की रखवाली से लौट आये थे. वे खूब चहक रहे थे. बोले, हरे पर तेजी से पीलापन छा रहा है! हवा कुछ तेज बहती है, तो खेतों से झनकार की आवाज उठने लगती है. यह धान के पकने का कलरव है!

बैलों का तो अब जमाना रहा नहीं. लेकिन गाय-भैंस पालने का मोह अभी बचा हुआ है. एक बछिया तो रहनी ही चाहिए. नहीं तो पर्व-त्योहार में गोबर भी दूसरे से मांगना पड़ जायेगा.

फिर जब किसी कारण बतकही होगी, तो गोबर के लिए उलाहाने सुनने को मिल जायेंगे- दशहरा में दसों दिन मेरी ही गाय के गोबर से तुम्हारा आंगन शुद्ध हुआ था! एक बात तो यह भी है कि दरवाजे पर एक ओर भूसे का खलिहान हो, एक कोने में पुआल का बड़ा सा ढेर हो, एक छोटा सा ही सही, गोहाल हो तो दरवाजा भरा-सा लगता है. देखकर इन्हें तुष्टि मिलती है.

चरने गये पशु शाम पांच-छह बजे तक अपने ठिकाने की तरफ लौटने लगते हैं. मेड़ दरअसल एक रास्ता होता है. अब बीच खेत से गुजर रहे पशुओं का मन हरियाली देखकर बहक गया, तो जब तक चरवाहे उन्हें रोकेंगे, पशु चार कौर खा ही लेंगे. कक्का इसी की पहरेदारी करने शाम को निकलते हैं और खेतों के चारों तरफ डोलते रहते हैं.

पशुओं में भी गजब का सेंस ऑफ ह्यूमर होता है. खेत-मालिक को देखकर वे समझ जाते हैं कि ये हरी-हरी घास नहीं, कोई फसल है. यहां मुंह नहीं मारना है. वे खेत-मालिक के हाथों में धरा मोटा सोंटा देखते हुए चुपचाप खेतों के बगल से गुजर जाते हैं. खेत-मालिक को मेड़ पर डोलते देखकर चरवाहे भी अतिरिक्त सजगता का परिचय देते हैं और पीछे देखते हुए पशुओं के आगे-आगे चलते हैं. कौन झगड़ा मोल ले!

तो कक्का पकते धान को देखकर चहक रहे हैं! मुझ पर नजर पड़ते ही बोले कि अब कुछ ही दिनों की बात है. फिर हमें हमारी मेहनत के फल मिलने शुरू हो जायेंगे! देखते-देखते आश्विन निकल जायेगा और कार्तिक से धन-कटनी शुरू!

कक्का धान में फूल आते देखकर भी ऐसे ही चहके थे. मैंने कहा तो वे हो-होकर हंसने लगे. बोले- तुम फूलों के बारे में क्या सोचते हो? फूल एक रहस्य को भेदने के लिए खिलता है. जब भी वह खिलता है, एक संदेश को हवा में उछाल देता है कि ठीक मेरे पीछे फल आ रहा है.

कक्का कह रहे थे कि जब धान में फूल आ रहे थे, खेतिहर तभी से झूम रहे हैं! इसी के इंतजार में खेतिहरों ने आकाश में उड़ते काले बादलों से पानी बरसने का मनुहार किया था. जब बारिश नहीं हुई, इसी फूल के इंतजार में पंपसेट का खर्चा उठाया था और खाद की फिक्र की थी.

कक्का का कहना था कि पहरेदारी तो एक बहाना होता है, दरअसल इन्हीं दानों को निहारने के लिए खेतिहर अपने खेतों की मेड़ पर डोलते पाये जाते हैं. कुछ दिन पहले जिस फसल में फूल आये थे, वे पहले दाने में परिवर्तित हुए और अब वे दाने पककर तैयार हैं, तो यह दृश्य देखकर किसका मन मयूर नहीं झूम उठेगा!

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