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गुलाबी रंग का समाजशास्त्र

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सन्नी कुमार
टिप्पणीकार
sunnyand65@gmail.com
गर्मी धीरे-धीरे अपने अवसान पर है. नये मौसम की आहट सुनायी दे रही है. ग्रीष्म की विदाई को आतुर मन ठंड की रूमानी कल्पना में मग्न ही था कि ‘गुलाबी जैकेट’ की याद आ गयी. पिछले साल एक दिन मैं इसे पहनकर ऑफिस चला गया. ऑफिस के एक दोस्त ने मेरे गाल खींचे और कहा कि ‘गुलाबी-गुलाबो’. गुलाबी यानी पिंक यानी लड़की. रंगों के इस अप्राकृतिक विभाजन के सैद्धांतिकी से मैं परिचित तो था, लेकिन व्यवहार के स्तर पर वह पहला अनुभव था.
आम धारणा है कि गुलाबी रंग लड़कियों का प्रतीक है. यह मानसिकता लंबे समय की वैचारिक स्वीकार्यता के प्रयास के बाद ही बना है. गुलाबी को अक्सर एक रूमानी, पर ‘कमजोर’ रंग के रूप में प्रस्तुत किया जाता है.
गुलाबी रंग सुनते ही मन में ऐसी कोमल दुनिया का चित्र उभरता है, जहां सब कुछ भोगने लायक है, जहां प्रतिरोध का भय नहीं है, जहां संघर्ष की गुंजाइश नहीं है, जहां सुंदर घर की कैद है लेकिन खुला आसमान नहीं है, जहां सिर्फ रूप का सौंदर्य है श्रम का नहीं. यानी गुलाबी रंग ‘स्त्री’ होने का प्रतीक है. स्त्रियों के पुरुषों से कमजोर होने की वैधता सिद्ध करने में गुलाबी रंग काफी सफल है.
इसमें रंगों का दोष नहीं है. दोष है हमारे उस वैचारिकी का, जिसमें हम किसी रंग के साथ कुछ खास विशेषताएं नत्थी कर देते हैं. इस प्रकार ‘स्त्री-पुरुष’ की दो दुनिया होने की दूरी रंगों के माध्यम से तय हो जाती है. सिनेमा जैसा माध्यम इस धारणा को और रूढ़ बनाता है. फिल्म बाहुबली-2 में बाहुबली का तीर नीला और देवसेना का तीर गुलाबी है. यह विभाजन इतना सहज है कि शायद ही कोई इस पर दिमाग खपाये.
जेंडर के आधार पर रंगों के विभाजन की प्रक्रिया इतनी सुदृढ़ हो चुकी है कि हम ‘गुलाबी ठंड’ तो कहते हैं, लेकिन ‘गुलाबी गर्मी’ नहीं कहते.
जब तक ठंड मनभावन है, तब तक वह गुलाबी है. जैसे ही ठंड से संघर्ष शुरू, उसका गुलाबीपन गायब. क्या जब हम गुलाबीपन को स्त्री विशेषता के साथ जोड़ते हैं, तब हम इस निष्कर्ष को नहीं मान रहे होते कि स्त्री मनभावन प्राप्ति जैसी कोई वस्तु संघर्षरहित भी है? अगर सच में स्त्री ऐसी न भी होती हो, तो क्या हमारी आकांक्षा यह नहीं होती कि स्त्री इसी गुलाबीपन की तरह हो, सुंदर-काम्य?
ऐसे विभाजन स्त्री-पुरुष के दो अलग संसार होने की मान्यता को पुष्ट करते हैं. यह न केवल रंगों की दुनिया सीमित बनाता है, बल्कि स्त्रियों के संघर्षशील और कठोर श्रमवान होने की मान्यता को खारिज करता है.
किसी लिंग विशेष द्वारा किसी रंग विशेष काे पसंद करना बुरी बात नहीं है, लेकिन एक सांस्कृतिक उत्पाद के रूप में किसी लिंग विशेष के साथ उसी के ‘गुणों’ से मिलते रंग को जोड़ सामान्यीकरण करना गलत है.
यह जैविक तात्विकवाद के उस विचार का पुनर्पाठ है, जिसमें पुरुष जन्मना श्रेष्ठ और महिलाएं अयोग्य होती हैं. हालांकि ये धारणाएं खंडित हुई हैं, पर रंग का विभाजन भी खत्म होना चाहिए. किसी की दुनिया इतनी एकाकी नहीं होती. फिर रंगों का जीवन इतना एकाकी क्यों? जिंदगी में सबको सब रंग मिलने चाहिए.
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