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प्रदूषण का कोहरा

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जाड़े के दिन राजधानी दिल्ली के लिए ठंड नहीं, बल्कि वायु प्रदूषण लेकर आते हैं. पिछले कुछ साल से तो ऐसा ही हो रहा है. इस साल अभी कायदे से जाड़े का आगाज नहीं हुआ है, पर दिल्ली में हवा की गुणवत्ता इतनी घट चुकी है कि प्रशासन को आपात योजना तैयार करनी पड़ी है.
इसके तहत डीजल जेनेरेटरों और भवन-निर्माण से जुड़ी गतिविधियों पर पाबंदी लग सकती है. अगर हालात ज्यादा खराब हुए, तो निजी वाहन चलाने के ऑड-ईवन का पुराना फाॅर्मूला भी लागू हो सकता है. ऐसे में उत्पादक गतिविधियों पर असर पड़ना तय है और शासन-प्रशासन को इस आलोचना का सामना करना होगा कि वांछित उपाय समय रहते क्यों नहीं किये गये. अन्य महानगरों का हाल दिल्ली से बेहतर नहीं है. मुंबई में तापमान रविवार को 37 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया और वायु गुणवत्ता का सूचकांक मॉनसून गुजरने के साथ फिर से 200 का अंकमान पार कर गया है.
यह बच्चों, बुजुर्गों तथा बीमार लोगों के लिए बहुत नुकसानदेह है. दिल्ली की मुश्किल का रिश्ता पड़ोसी हरियाणा और पंजाब के किसानों द्वारा पराली जलाने के चलन से जोड़ा जाता है, जबकि मुंबई में इसका कारण औद्योगिक उत्पादन, निर्माण कार्य तथा परिवहन से. हरियाणा और पंजाब में भूजल का स्तर बहुत नीचे चला गया है, जबकि धान की खेती में पानी का इस्तेमाल ज्यादा होता है. सो, जल संरक्षण के लिए पंजाब सरकार तीन सालों से धान की खेती की शुरुआत के लिए खास तारीख तय करती है. इस साल यह 20 जून था. धान की कटनी में भी देरी से गेहूं की बुआई के लिए समय कम मिलता है.
ऐसे में किसान धान की पराली खेतों में जलाना बेहतर मानते हैं. यों हरियाणा और पंजाब में किसानों को कुछ मशीनें कम कीमत पर देने की नीति अपनायी गयी है, फिर भी ये महंगी हैं. ऐसे में पराली जलाना एक तरह से मजबूरी है. बहरहाल, यह याद रखना होगा कि वायु प्रदूषण देशव्यापी समस्या है. इसके लिए पराली जलाने जैसे स्थानीय कारणों को दोष देकर निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक आकलन के मुताबिक दुनिया के सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण से ग्रस्त 15 शहरों में 14 भारत में हैं और देश के ज्यादातर इलाकों में वायु की गुणवत्ता लगातार घट रही है.
वायु प्रदूषण को बढ़ते मनोरोगों और मधुमेह का एक कारण भी माना गया है. भारत में रोगों के कारण असमय मौत के 30 फीसदी मामलों में मुख्य वजह वायु प्रदूषण है. सनद रहे, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान बढ़ने तथा प्रदूषित पानी और खाने का कहर भी हमारे सामने है.
आरोप-प्रत्यारोप और लापरवाह कोशिशों से ठोस उपाय नहीं हो सकते हैं. निरंतर गंभीर होती जाती इस समस्या के समाधान के लिए राष्ट्रव्यापी नीति बनाने और उसे तत्परता से अमली जामा पहनाने की जरूरत है, ताकि आपात उपाय अपनाने की हड़बड़ी और परेशानी से बचा जा सके.
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