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धरती की पूजा करता हरसिंगार

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मिथिलेश कु. राय
युवा रचनाकार
mithileshray82@gmail.com
कक्का गजब आदमी हैं. परसों एकदम सवेरे हम पहली चाय पी रहे थे. वे पूरब की तरह निहार रहे थे. मैं यह सोच ही रहा था कि अब वे कुछ बोलेंगे कि वे बोल उठे- सामने देखो कि कैसे हरसिंगार अपने फूलों से धरती मैया की पूजा कर रहा है!
मैंने पूरब की ओर देखा. कोने में, जहां अमरूद का पेड़ है. उसी के बगल में हरसिंगार का एक पेड़ भी है. मैंने देखा-नीचे की मिट्टी पर ढेर सारे ताजे फूल गिरे हुए थे. मैं अपलक इस दृश्य को कुछ देर तक देखता ही रह गया. हरसिंगार का यह पेड़ पिछले तीन साल से फूल दे रहा है, लेकिन इसे इस तरह पहले कभी नहीं देखा. सचमुच! ऐसा लग रहा था, जैसे पौधे अभी-अभी मिट्टी की पूजा करके उठे हों!
मैं कक्का की तरफ मुड़ा, तो वे मंद-मंद मुसकुरा रहे थे. बोले- कहो तो, क्या तुम किसी ऐसे फूल के बारे में बता सकते हो, जो इस तरह धरती मैया की पूजा करता हो?
मैं सचमुच नहीं जानता था कि हरसिंगार के अलावे किसी और फूल को नीचे से चुना जाता हो. आज तक जितने भी फूलों को मैंने देखा है, वे सब के सब बिना तोड़े नहीं टूटते हैं. तोड़नेवाले हाथ उसे तोड़कर तुरंत डाली में रख लेते हैं. कोई फूल बिना तोड़े अगर धरती पर गिरता भी है, तो जब वह मुरझा जाता है और उसकी डंठल कमजोर हो जाती है, तब ही ऐसा संभव हो पाता है.
एक हरसिंगार ही है, जो रोज ब्रह्ममुहूर्त में अपने ताजे फूलों से धरती की पूजा करता है. कक्का उन प्यारे फूलों की ओर देखते हुए कह रहे थे कि हरसिंगार बारहमासा फूल नहीं है. यह सर्दी के आने से पहले फूलना शुरू होता है और वसंत के बाद बंद. अब यह देखो कि कोई बिना जल के पूजा कैसे करेगा. पूजा में फूल और जल ये दोनों होना चाहिए. बाकी कुछ रहे न रहे. चूंकि हरसिंगार ब्रह्ममुहूर्त में इस पृथ्वी की पूजा करता है, तो ओस के रूप में उसके लिए जल की व्यवस्था भी हो जाती है.
कक्का रौ में कहे जा रहे थे- या यह होता होगा कि पहले ओस की बूंदें उसे शुद्ध करती होंगी. फिर हरसिंगार फूल बरसाकर मिट्टी की पूजा करता होगा. इसके बाद ही चिड़िया जगती होंगी. सूरज की आंखें खुलती होंगी!
कक्का जब भी चीजों को इस रूप में देखने लगते हैं, मैं बस सुनता रहता हूं. कक्का खेतिहर हैं न, वे अधिकतर चीजों को मिट्टी-पानी से जोड़कर देखते हैं.
वे कहते हैं कि बिना मिट्टी-पानी के अधिकतर चीजों का अस्तित्व रह ही कहां जायेगा. सारी चीजें गड़बड़ा जायेंगी. कक्का उनके हरे-भरे पौधे को निहारने लगे थे. या यह भी हो सकता है कि हरसिंगार रोज अपना सारा फूल इस धरती को अर्पित कर देता हो कि लो, तुम्हीं से हम हैं. सब तेरा ही है.
कक्का कह रहे थे कि जिस मिट्टी ने इस पेड़ को पनपाया, उसकी जड़ों को अपने गर्भ से पानी दिया, उसे फूलता देख हर्षित हुआ, यह उसी उपक्रम के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक सिलसिला हो सकता है. कक्का कह रहे थे कि बाद में भले ही फूलों को वहां से उठा कर लोग उसका विभिन्न कार्यों में इस्तेमाल करते हो, लेकिन उससे पहले हरसिंगार मिट्टी के प्रति अपना अनुराग दिखा चुका होता है!
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