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Home Opinion बढ़ाये जायें नौकरियों के मौके

बढ़ाये जायें नौकरियों के मौके

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वरुण गांधी
सांसद, भाजपा
fvg001@gmail.com
भारत युवाओं के लिए रोजगार पैदा करनेवाला आकर्षक स्थान होना चाहिए. आखिर यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है.फिर भी, कहीं कुछ गड़बड़ है- सरकारी क्षेत्र की किसी भी भर्ती का ऐलान होते ही भारी संख्या में आवेदक दौड़ पड़ते हैं, जिनमें से अधिकांश ओवर-क्वाॅलिफाइड होते हैं.
हाल ही में, रेलवे भर्ती बोर्ड ने करीब 1.9 लाख पदों को भरने के लिए परीक्षाएं आयोजित कीं, तो इसके लिए 4.25 करोड़ से अधिक आवेदन आये. यानी एक पद के लिए 225 आवेदन. यहां तक कि ग्रुप डी पदों के लिए पीएचडीधारियों ने आवेदन किया. ऐसे अनेक उदाहरण हैं.
जाहिर है, हमारे जॉब मार्केट में कुछ गड़बड़ है. निजीकरण के आगमन के बाद भी, सार्वजनिक क्षेत्र अभी भी नौकरी की बेहतर सुरक्षा प्रदान करता है और कई सेवानिवृत्ति लाभ देता है, जिसका बहुत कम वेतन देनेवाला निजी क्षेत्र कभी मुकाबला नहीं कर सकता. ऐसा लगता है कि चुनौती हमारी अर्थव्यवस्था के ज्यादा नौकरियां पैदा करने में असमर्थता में निहित है.
यह देखते हुए कि हमारा लेबर मार्केट डेटा बहुत अस्पष्ट और बिखरा हुआ है, इस समस्या की गहराई मापना मुश्किल है. नेशनल सेंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) का रोजगार-बेरोजगार सर्वे का जितना भी डेटा उपलब्ध है, ताजा है; जबकि अन्य स्रोतों का दायरा सीमित है. तिमाही रोजगार सर्वे (क्यूईएस) रिपोर्ट आठ प्रमुख उद्योगों में पैदा हुए रोजगार के बारे में है. हालांकि, ऐसे सर्वे रोजगार की गुणवत्ता को दर्ज करपाने में नाकाम हैं, जिससे प्रच्छन्न और लाभकारी रोजगार को लेकर हमारे पास कोई जानकारी नहीं होती है.
सातवां तिमाही रोजगार सर्वे बताता है कि 1.36 लाख नौकरियां पैदा की गयीं- जो पिछली तिमाही में पैदा हुई 64,000 नौकरियों की तुलना में काफी अधिक है- लेकिन यह हर महीने वर्क फोर्स में शामिल हो जानेवाले 10 लाख से अधिक लोगों की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकती है.
नौकरी से जुड़े हमारे कर्मचारियों का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में लगा हुआ है, और केवल 17 प्रतिशत वास्तव में नियमित वेतन पाते हैं. यहां हासिल की गयी शिक्षा और मिलनेवाले जॉब के बीच भी भारी अंतर्विरोध है. पांचवें वार्षिक रोजगार-बेरोजगार सर्वेक्षण में सामने आया कि केवल 21.6 प्रतिशत कर्मचारियों को वास्तव में सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिला है.
आदर्श तौर पर बढ़ते निवेश के चलते ज्यादा सार्वजनिक खर्च इस जॉब संकट से निपटने के लिए समाधान पेश कर सकता है. हालांकि आठ साल की निवेश मंदी (आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18), तकरीबन स्थिर निर्यात और बढ़ते आयात बोझ के कारण ऐसे निवेश का फायदा मिलने के अवसर सीमित हैं.
बढ़ता ऑटोमेशन इस समस्या को और गंभीर बनाता है, तथा भारत के विकास मार्गों को अवरुद्ध कर देता है. विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, ऑटोमेशन के कारण भारत में करीब 69 प्रतिशत जॉब्स खतरे में हैं, जिसके चलते रोजगार नीति में रोजगार के नये तरीकों के निर्माण पर ध्यान देने की जरूरत है. इस बीच, प्रमुख उद्योगों में रोजगार उत्पादन (उदाहरण: वस्त्र) नीति और नीयत के जाल में उलझा हुआ है.
भारत को समग्र राष्ट्रीय रोजगार नीति की जरूरत है, जो रोजगार के क्षेत्रों के अलावा विभिन्न सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर नीतिगत इनपुट दे सकती हो. ऐसी नीति सामाजिक उत्पादक जीवन के लिए काम करते हुए युवाओं के सुरक्षित, स्वस्थ, सुखद और टिकाऊ विकास के वास्ते देश की आकांक्षाओं को परिभाषित करेगी.
इस नीति में कारगर समाधान देने के साथ ही सरकार की रोजगार, हेल्थ-केयर और सामाजिक सुरक्षा आदि नीतियों का युवा-उन्मुखी नजरिया भी दिखना चाहिए. श्रम कानूनों में सुधार करने और रोजगार पैदा करनेवाले प्रमुख उद्योगों को टैक्स लाभ देने की जरूरत है- ऑटोमोटिव की तुलना में परिधान उद्योग 80 गुना अधिक श्रम प्रधान है; इस्पात से 240 गुना अधिक श्रम प्रधान; और इसमें हर एक लाख रुपये के निवेश पर 29 अतिरिक्त नौकरियां (महिलाओं के लिए 8 सहित) पैदा की जा सकती हैं. लेदर और फुटवियर क्षेत्र में निवेश किये गये प्रत्येक लाख रुपये से अंदाजन सात नयी नौकरियां (आर्थिक सर्वेक्षण, 2016-17) पैदा की जा सकती हैं.
नौकरियों की मात्रा के अलावा नौकरियों की गुणवत्ता भी मायने रखती है, जिसे स्किलिंग कार्यक्रमों की पहुंच बढ़ाने और इनके स्तर में सुधार से हासिल किया जा सकता है. ठप उद्योग-धंधों के पुनरुत्थान के लिए गतिविधि/स्थान/उद्योग आधारित प्रोत्साहनों के प्रस्तावों के अलावा जॉब-आधारित वित्तीय प्रोत्साहनों पर विचार किया जा सकता है.
हमें अपने रोजगार दफ्तरों को भी सुधारने, उन्हें जॉब सेंटर में बदलने की जरूरत है- भले ही इन्हें सरकार द्वारा चलाया जाये या निजी हाथों में दे दिया जाये.
इनके यूनाइटेड किंगडम के जॉब सेंटर प्लस की तरह सोशल सिक्योरिटी लाभ वितरण के साथ तालमेल से वेल्फेयर प्रणाली को सुव्यवस्थित करने में भी मदद मिलेगी. राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (एनएसडीसी) को युवा विकास सहायता कार्यक्रम शुरू करने पर विचार करना चाहिए, जिसके तहत युवाओं को कौशल विकसित करने में मदद देनेवाले गैरसरकारी संगठनों को वित्तीय सहायता दी जाये. जिला स्तर पर अप्रेंटिसशिप प्रोग्राम चलाने की भी जरूरत है.
उद्यमिता को सामाजिक प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए. एसएमई (लघु और मध्यम उद्यम) कारोबार शुरू करने में बाधाओं को हटाना एक प्रमुख उपाय है. फाइनेंस तक पहुंच की कमी, सरकारी योजनाओं के बारे में सीमित जागरूकता और बुनियादी ढांचे की बाधाएं विकास की कोशिशों का गला घोंट रही हैं.
भारत के बैंकिंग क्षेत्र को एसएमई क्षेत्र में भारी निवेश करने की दिशा में प्रोत्साहित करने की जरूरत है. आईआईटी और आईआईएम जैसे व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थानों में दो साल के प्लेसमेंट हॉलिडे जैसे उपायों का उपयोग जोखिम लेने को बढ़ावा देने के लिए किया जाना चाहिए. जॉब सेंटर स्थानीय उद्यमियों को पैसे का इंतजाम करने में मदद करके और व्यापार योजना की समीक्षा करते हुए उनको संरक्षण दे सकते हैं.
भारत के नेताओं और युवाओं के बीच तालमेल फिलहाल टूट गया है. आर्थिक समृद्धि नहीं आने से युवाओं में गुस्सा है. हमारे जनसांख्यिकीय लाभ का भी इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है. युवा विकास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है.
उन्हें एक स्वागतयोग्य व उत्साहजनक माहौल प्रदान करना हमारे हित में है और हमारी जिम्मेदारी भी है. बेरोजगारी उनकी सबसे बड़ी परेशानी बनी हुई है. इस परेशानी को हल करने में सिर्फ लफ्फाजी से काम नहीं चलेगा.
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