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Home Opinion इसलिए मैं भी चोर हूं!

इसलिए मैं भी चोर हूं!

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आलोक पुराणिक

वरिष्ठ व्यंग्यकार

puranika@gmail.com

अब विमर्श बदल गये हैं सोशल मीडिया के दौर में. हैशटैग # लगाकर कोई कुछ भी शुरू कर सकता है. थोड़ी देर में कुछ का कुछ हो सकता है, बहुत कुछ तक हो सकता है.

एक महिला मित्र ने कहा- कोई पुरुष, जो किसी स्त्री को बीस सेकेंड से ज्यादा देखता है, वह अपनी आंखों से स्त्री का बलात्कार करता है. मैंने निवेदन किया- हो सकता है कि तुम्हारी यह बात कुछ के लिए ठीक हो, पर हर पुरुष के लिए इस तरह जनरल स्टेटमेंट देना ठीक नहीं है.

विमर्श में बैठे एक उत्साही पुरुष ने कहा- हां, हर पुरुष बलात्कारी है, आंखों से रेप करता है. उसने हैशटैग लगाकर ट्विटर पर अभियान शुरू कर दिया- #मैं रेपिस्ट हूं.

मुझ पर दबाव डाला गया कि मैं भी हैशटैग लगाकर अपने ट्विटर हैंडल पर लिखूं कि मैं रेपिस्ट हूं. मैंने आपत्ति की कि पकड़े गये बाबा लोग तक नहीं मान रहे हैं कि वे रेपिस्ट हैं और आप मुझसे उम्मीद करते हैं कि मैं मान लूं?

मुझे उत्साही मित्रों ने अपने ग्रुप से डिसमिस कर दिया है. अतिवादी आंदोलनों की पनाहगाह सोशल मीडिया हो गया है. कोई एक दिन रेपिस्ट बन जाता है, वही दूसरे दिन चोर बन जाता है. एक क्रांतिकारी मित्र ने अभियान शुरू किया- #मैं चोर हूं.

चोरगिरी की घोषणा का बैकग्राउंड यह था कि एक चेनस्नैचर को सड़क पर धर लिया गया था और पब्लिक ने जमकर उसकी पिटायी कर दी. चोर की हालत देख द्रवित हुए क्रांतिकारी मित्र ने कहा- लोग अरबों चुराकर लंदन भाग गये और वहां क्रिकेट मैच देखते हैं. यह छोटा चोर यहीं धर लिया गया, तो पिट गया!

मैंने कहा कि इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि चोरी करे बंदा, तो टाप क्लास की, विजय माल्या के लेवल की. यह क्या कि लोकल सड़क पर चेनस्नैचिंग करने लगे, पर क्रांतिकारी मित्र तो क्रांति पर अामादा थे. उन्होंने करीब पांच हजार रुपये की शराब पीते हुए दुख व्यक्त किया कि इस चोर सिस्टम को मैं सुधार नहीं पा रहा हूं, इसलिए मैं भी चोर हूं!

मैंने निवेदन किया कि पांच हजार रुपये दारू में न गलाकर उस चेनस्नैचर की जमानत करवा लो. फिर उस चेनस्नैचर को कोई काम-धंधा दिलवायेंगे, लेकिन मित्र नहीं माने. उन्होंने शराब पर ही दस हजार खर्च कर दिये और दुख में हैशटैग अभियान चला दिया- #मैं भी चोर हूं! वे मित्र अड़ गये कि मैं भी ट्विटर हैंडल पर लिखूं- #मैं भी चोर हूं.

सोशल मीडिया पर तरह-तरह के ऐसे अभियान चल रहे हैं- मैं लुच्चा हूं. मैं टुच्चा हूं. मैं झूठा हूं. मैं लफंगा हूं. मैं लड़की छेड़ता हूं. ओ भाई, मैंने कभी नहीं छेड़ी लड़की, तो क्यों कहूं भावुक अतिवादिता में कि मैं लड़की छेड़ता हूं?

एक क्रांतिकारी मित्र ने कहा- मानता तो कभी विजय माल्या भी नहीं है कि उसने रकम पार की है.

ट्विटर क्रांतिकारी मित्र ने एक झटके में ही मुझे विजय माल्या के लेवल पर खड़ा कर दिया है.

सोशल मीडिया में कुछ भी हो सकता है बॉस!

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