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ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ते कदम

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सूरज को विश्व की ऊर्जा-जरूरतों का मुख्य स्रोत बनाने की दिशा में प्रयत्नशील वैश्विक मंच का नाम है अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए). दुनिया के 121 देशों के इस गठबंधन की पहली बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस आत्मविश्वास से कहा कि आईएसए अगले कुछ दशकों में ओपेक (कच्चे तेल के प्रमुख निर्यातक देशों का संघ) का स्थान ले सकता है, उसके दो संकेत बड़े स्पष्ट हैं.

एक तो यह कि अक्षय-ऊर्जा स्रोतों के उपयोग को लेकर बननेवाली वैश्विक सहमति में भारत की भूमिका अग्रणी रहेगी और दूसरे यह कि ‘जलवायु-परिवर्तन’ को विषय बनाकर दुनिया में विकसित और विकासशील देशों के बीच जो भू-राजनीतिक रस्साकशी चल रही है, उसमें भारत के आर्थिक विकास से जुड़े हितों की अनदेखी कर पाना महाशक्ति कहलानेवाले देशों के लिए मुश्किल होगा. अमेरिका और चीन की तरह भारत ग्रीनहाऊस गैसों के सर्वाधिक उत्सर्जन करनेवाले देशों में शुमार है. ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन का एक रिश्ता धरती का तापमान बढ़ने से है और वैज्ञानिक इसे जलवायु-परिवर्तन के कारण के रूप में चिह्नित करते हैं.

शोध-अध्ययनों में आशंका जतायी जाती है कि जलवायु-परिवर्तन के दुष्परिणाम भारत के लिए बहुत गंभीर होंगे. भारत को पेरिस जलवायु समझौते के अनुकूल अगले एक दशक में कार्बन फुट प्रिंट में एक नियत स्तर (साल 2005 के कार्बन फुट प्रिंट का 30 से 35 प्रतिशत) तक कमी लाना है. सो, जलवायु-परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचने और धरती पर मौजूद जीवन के प्रति साझी मानवीय जिम्मेदारी के लिहाज से सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा सरीखे नवीकरण स्रोतों से अपनी ऊर्जा जरूरतों को यथासंभव पूरा करना भारत सहित सभी आर्थिक महाशक्तियों के साझे हित में है. भारत ने अपनी जिम्मेदारी के अनुकूल अक्षय-ऊर्जा स्रोतों के उपयोग के क्षेत्र में तेजी से कदम उठाये हैं. बीते साल नवंबर तक देश में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त बिजली की संधारित्र क्षमता 62 गीगावाट तक थी और इसमें 27 गीगावाट की संधारित्र-क्षमता सिर्फ मई 2014 से नवंबर 2017 के बीच हासिल की गयी.

साल 2022 तक सौर ऊर्जा की 100 गीगावाट और पवन ऊर्जा की 60 गीगावाट संधारित्र क्षमता हासिल करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य सरकार ने बनाया है. अगर अपेक्षित गति बनी रही, तो 2030 तक भारत की ऊर्जा जरूरतों का 40 प्रतिशत हिस्सा अक्षय-ऊर्जा स्रोतों से पूरा हो सकेगा. भारत सरीखे विकासशील देशों को जरूरी प्रौद्योगिकी और ग्रीन क्लाइमेट फंड सहित अन्य अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से कम लागत पर वित्तीय मदद मिलना जरूरी है.

आईएसए में भारत की अग्रणी भूमिका इसी कारण बहुत महत्वपूर्ण है. प्रधानमंत्री मोदी को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैन्युएल मैक्रों के साथ संयुक्त रूप से यूएन का सर्वोच्च पर्यावरणीय पुरस्कार मिलना अक्षय-ऊर्जा के इस्तेमाल के मामले में वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते महत्व का ही संकेत है.

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