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बदला है कहने का ढर्रा

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बदला है कहने का ढर्रा

दिव्य प्रकाश दुबे

कहानीकार

authordivyaprakash@gmai- .com

इस वक्त जो हिंदी उभर रही है, उसका कारण सिर्फ लेखक नहीं हैं, बल्कि नयी तकनीक भी है और उसके साथ चलनेवाले प्रकाशक भी हैं. इस वक्त ऑनलाइन के जरिये तकरीबन 80 प्रतिशत तक पठन सामग्री सिर्फ हिंदी में ही पढ़ी जा रही है. यह आंकड़ा बताता है कि हिंदी अब ‘डिमांड’ में है.

हम कहीं भी रह रहे हों, लेकिन हम सब में एक गांव बसता है. हिंदी फौरन गांव से जोड़ देती है और इसलिए हमें हिंदी में लिखने-पढ़ने में ज्यादा सुकून मिलता है. यही वह तत्व है, जिसकी बुनियाद पर खड़ी हिंदी अब लोगों तक पहुंच रही है.

नयी तकनीकों ने हिंदी को जितना आसान बनाया है, उतना साहित्यकारों ने नहीं बनाया. अब तो आलम यह है कि जिन्होंने हिंदी माध्यम से पढ़ाई तक नहीं की है, उन्हें भी गर्व होने लगा है हिंदी पढ़ने-लिखने में. हम जैसे नयी हिंदी वाले लेखकों ने उनके अंदर छुपे इस भाव को बाहर निकाला है, यही हमारी कामयाबी है.

हर व्यक्ति कुछ पढ़ना चाहता है, शर्त यह है कि उसकी रुचि कैसे जगायी जाये. इसलिए लेखक के लिए जरूरी है कि वह पाठक के लिए तो लिखे ही, जो पाठक नहीं हैं, उनके लिए भी लिखे. साल 1995 के बाद से हिंदी के लेखकों ने सिर्फ एक-दूसरे के लिए ही लिखा है. बीते दो दशक में कुछ बड़े शहरों में हर साहित्यिक गोष्ठी में एक प्रेमचंद या एक निराला पैदा होने लगा था, जिसका साहित्य महज कुछ सौ लेखकों की जमात तक ही पहुंच पाता था. हमारी कोशिश इस ढर्रे से बाहर निकलने की थी, इसलिए हमने वह लिखा, जो गैर-पाठक और गैर-साहित्यिक रुचिवाले लोग भी हमें पढ़ सकें. हम इसमें कामयाब हुए, क्योंकि हमने उनकी फीलिंग्स को रिलेट करके लिखा. साहित्यिक मठाधीशी से अलग होकर हमने कहानियों का ढर्रा बदला, उसकी जबान बदली, और यह सब हमने जान-बूझकर किया.

हमारी पहली लड़ाई यह नहीं थी कि हम अच्छा लिखें या खराब लिखें. बल्कि, यह थी कि कैसे हम ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचें. क्योंकि इसका अर्थ है ज्यादा से ज्यादा लोगों में पढ़ने की भूख का पैदा होना. और जब पढ़ने की भूख बढ़ जायेगी, तब तो लोग खुद ही धीरे-धीरे गालिब-मीर या, तुलसी-कबीर या फिर प्रेमचंद-निराला तक पहुंच जायेंगे. आज आप देख सकते हैं कि नयी उम्र के लोगों के पास पढ़ने के अलावा दूसरे बहुत से ऑप्शन हैं, जिनमें वे व्यस्त रहते हैं. इंटरनेट है, गूगल है, यूट्यूब है, सोशल मीडिया है, नेटफ्लिक्स है, सिनेमा है, वगैरह.

मसला यहीं था कि कैसे इनके इन ऑप्शंस में पढ़ने का भी एक ऑप्शन डाला जाये. हमने कोशिश की और आज तो यह पीढ़ी अब हिंदी किताबों को चुन-चुनकर पढ़ने लगी है. एक जमीन तैयार हो गयी है पाठकों की. अब लेखकों की जिम्मेदारी है कि हम बड़ी कहानियां कहें और उनके लिए बड़ी रचनाएं लेकर आएं. मतलब यह कि हिंदुस्तान का हिंदी में एक ‘हैरी पॉटर’ तैयार हो, जिसे हर वर्ग के पाठक हाथों-हाथ ले सकें.

कहानी या रचनाओं का कैनवस जितना ही आम लोगों से जुड़नेवाला होगा, उतना ही हिंदी के लिए फायदा है. तब ज्यादा से ज्यादा लोग लिखने भी लगेंगे, क्योंकि हर किसी में कुछ कहने की भावनाएं पलती ही रहती हैं.

सिर्फ वही क्यों लिखें, जो हिंदी से बीए, एम या पीएचडी की हो या फिर हिंदी का अध्येता हो. उन्हें भी लिखना चाहिए, जो इंजीनियर हैं, जो एमबीए स्टूडेंट हैं, जो डॉक्टर हैं, बिजनेसमैन हैं, या फिर किसी और ही प्रोफेशन में हैं. तभी हिंदी का दायरा बढ़ेगा, कंटेंट की दुनिया का विस्तार होगा.

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