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Home Opinion एक भाषा नहीं, विविध रूपों से जब सजेगी हिंदी!

एक भाषा नहीं, विविध रूपों से जब सजेगी हिंदी!

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एक भाषा नहीं, विविध रूपों से जब सजेगी हिंदी!

डॉ प्रवीण कुमार झा

चिकित्सक, नॉर्वे

doctorjha@gmai- .com

नीदरलैंड के एक बुजुर्ग ने कहा, जिनके पूर्वज कभी गिरमिटिया बनकर सूरीनाम गये थे. मेरे अनुमान में वह भोजपुरी बोल रहे थे, लेकिन ‘हिंदुस्तानी’ से उनका क्या अर्थ था? मैं कौन सी भाषा बोल कर सुनाऊं?

प्रवासी भारतीयों का वह वर्ग जो 19वीं सदी के उत्तरार्ध में भारत से प्रवास करना शुरू हुआ, उनके लिए ‘हिंदुस्तानी’ भाषा एक बड़ा समुच्चय है.गिरमिटिया मजदूर जब जहाजी बन कर गये, तो उनमें अवधी, भोजपुरी, मैथिली, ब्रजभाषा, बंगाली, पंजाबी, तमिल, तेलुगु सभी भाषाओं को बोलनेवाले लोग थे. उनकी एक सामूहिक भाषा जो बनी, वह उनके लिए हिंदुस्तानी थी. और इनके भी कई रूप बने जैसे फिजी हिंदुस्तानी, सरनामी हिंदुस्तानी, कैरिबियन हिंदुस्तानी इत्यादि. जैसे उन देशों में जातीय विभाजन नहीं था, भाषाई विभाजन भी नहीं था. एक ही सामूहिक भाषा- हिंदुस्तानी थी!

प्रो चान चुनी ने मुझे कहा कि सूरीनाम के गिरमिटिया स्कूलों में ‘हिंदुस्तानी’ भाषा ही पढ़ायी जाती थी, क्योंकि डच नीति थी कि उनकी ‘आदत’ बनी रहे.

इसकी वजह यह भी थी कि अगर वह डच पढ़-लिख गये, तो किसानी-मजदूरी न त्याग दें. म्यांमार के जेरावद्दी में भी हिंदी सिखाने का यही तर्क था. जैसे भारत में अंग्रेजी सीखकर सामाजिक सीढ़ी में ऊपर चढ़ना आसान हुआ, वैसे ही उन देशों में भी विदेशी भाषा सीखकर यह आसान होता. लेकिन भारत में हिंदुस्तानी/हिंदी की ‘आदत’ बनी रहती, तो क्या भारत एक कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था ही रह जाती? यह तुलना ही निरर्थक लगती है, क्योंकि वह सूरीनाम था, यह भारत है. विडंबना यह है कि तर्क फिर भी सही बैठता है. भारत की सामाजिक और आर्थिक सीढ़ी वाकई अंग्रेजी बन गयी.

महात्मा गांधी के 1916 के बनारस भाषण को अगर याद करें, ‘एक ऐसा आजाद भारत, जहां अपने देश में अपनी भाषा बोली जाती है, विदेश की नहीं. ऐसी भाषा जो दिल को छू जाती है. ऐसी भाषा जो गरीब से गरीब समझ सके, और हम उनके बीच जा सकें. आज तो हमारी पत्नियां भी विमर्श में शामिल नहीं हो पाती.’ इस भाषण के सौ वर्ष बाद हिंदी की स्थिति कुछ बदली जरूर है, पर अब भी सफर लंबा है.

मैं वापस प्रवासी हिंदुस्तानी भाषा पर आता हूं कि इसका आज का स्वरूप क्या है. अब पहले प्रवासियों की चौथी-पांचवी पीढ़ी फिजी से जीबूटी तक फैली है. कनाडा के पंजाबी मूल के प्रवासी वंशजों से जब बात करता हूं, तो वह पंजाबी में बात करते हैं और मैं हिंदी में. इसमें अंग्रेजी के बिना हमारा वार्तालाप धारा-प्रभाव संभव होता है.

गांधी ने बंबई के कांग्रेस अधिवेशन का जिक्र किया, जहां उनके हिंदुस्तानी भाषण को समझने में बंबइया या मराठी और गुजराती भाषीयों को समस्या नहीं हुई. गांधी की जो चिट्ठियां चंपारण या गिरमिटिया देश पहुंची, वह भी अंग्रेजी या गुजराती में न होकर हिंदुस्तानी में थी. वजह यह थी कि इन प्रदेशों की जनता ‘हिंदुस्तानी’ ही समझती थी.

एक विभाजन जो सतही तौर पर प्रवास में नजर आता है, वह है दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीय प्रवासियों में. लेकिन उनमें भी 19वीं और 20वीं सदी में प्रवास कर चुकी जमात हिंदुस्तानी ही बोलती रही. फ्रेंच उपनिवेश इनमें अपवाद हैं, जिन्होंने भारतीय भाषा लगभग खत्म कर दी थी.

आजादी के बाद जब भारत में भाषाई विभाजन मुखर हुआ, तो तमिल प्रदेश के लोग देश के बाहर भी तमिल ही बोलते रहे. ध्यान दें कि यह आजादी के बाद की शिक्षित पीढ़ी है. जो तमिल वर्ग बंबई या दिल्ली गया, वह तो हिंदी सीख ही गया.

प्रवासी भारतीयों में, खास कर इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में, अगली पीढ़ी अंग्रेजी-भाषी बनती जा रही है. लेकिन, जिन देशों की भाषा अंग्रेजी नहीं, वहां हिंदी और भारतीय भाषाओं का उपयोग अब भी कुछ बेहतर है. यूरोप में जब मैं तमिल मित्रों के साथ फुटबॉल खेलता हूं, तो हमारी सामूहिक भाषा फिर से हिंदी बन जाती है. इसके मनोविज्ञान में ही भाषाई विकास का सूत्र है. हिंदी में एक मूलभूत क्षमता है कि वह भारतीय भाषा है.

हां, हिंदी को समावेशी, सहयोगी और ‘हिंदुस्तानी’ भाषा जरूर बनना होगा. भोजपुरी, मैथिली, बंगाली, पंजाबी, गुजराती, तमिल, तेलुगू, राजस्थानी और अन्य भाषाओं को हिंदी से जोड़ना होगा. हर भाषा के शब्द उपयोग होते रहेंगे और विविध रूप से हम बोलते-लिखते रहेंगे. एक रूप, एक भाषा नहीं. विविध भाषा, विविध रूपों से जब सजेगी हिंदी!

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