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Home Opinion इवीएम पर बेवजह की बहस

इवीएम पर बेवजह की बहस

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आशुतोष चतुर्वेदी
प्रधान संपादक, प्रभात खबर
ashutosh.chaturvedi
@prabhatkhabar.in
जब भी चुनाव नजदीक आते हैं, इवीएम का जिन्न बाहर आ जाता है. जैसे-जैसे तीन राज्यों में विधानसभा और लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, कुछेक दलों ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (इवीएम) को मुद्दा बनाना शुरू कर दिया है.
हाल में चुनाव आयोग ने इवीएम को लेकर सर्वदलीय बैठक बुलायी थी. इसमें इवीएम अथवा मतपत्र से चुनाव कराये जाने पर विस्तार से चर्चा हुई, लेकिन कोई आम सहमति नहीं बन पायी. कई राजनीतिक दल इवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं और इसके बदले मतपत्र से चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं.
कांग्रेस, सपा, बसपा और आप जैसी पार्टियां मतपत्र से चुनाव कराने की मांग कर रही हैं, वहीं भाजपा व कई अन्य दलों का कहना है कि अगर ऐसा किया गया, तो बूथ कैप्चरिंग की घटनाएं बढ़ जायेंगी. आपको याद होगा कि कैसे कई कई दिनों तक मतपत्रों की गिनती चलती रहती थी और कितनी देर में पूरे नतीजे आ पाते थे. और कहीं गिनती पर विवाद हो गया, तो फिर पूरी प्रक्रिया दोहरायी जाती थी.
बैठक में इवीएम के साथ परची वाली मशीन वीवीपैट को जोड़ने की मांग भी उठी. वीवीपीटी के लिए केंद्र सरकार धनराशि जारी करने पर सहमत हो गयी है. वीवीपैट इवीएम की तरह ही होती है, लेकिन इसमें वोटिंग के समय एक पर्ची निकलती है, जिसमें यह जानकारी होती है कि मतदाता ने किस उम्मीदवार को वोट डाला है. इससे मतदाता को यह पता चल जाता है कि उसका वोट सही उम्मीदवार को गया या नहीं.
लोकतंत्र का बुनियाद तत्व है कि मतदान प्रक्रिया निष्पक्ष हो और जिसमें मतदाता को यह भरोसा हो कि उसका वोट वहीं पड़ा है, जहां वह देना चाहता था. इवीएम में गड़बड़ी के आरोपों में भले ही कुछ दम नहीं है, लेकिन बार-बार इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाये जाने से लोगों के मन में संशय उत्पन्न हो जा रहा है.
जब पेपर बैलेट का इस्तेमाल होता था, तो सही स्थान मुहर न लगने के कारण लगभग चार से पांच फीसदी वोट रद्द हो जाते थे. वहीं, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में बूथ कैप्चरिंग एक बड़ी समस्या थी. इवीएम के इस्तेमाल से बूथ कैप्चरिंग संभव नहीं रही. कुछ समय पहले भी कुछेक राजनीतिक दलों ने इवीएम के निष्पक्षता पर सवाल उठाये थे. चुनाव आयोग ने इन भ्रांतियों को दूर करने के लिए सभी दलों को इसे हैक कर दिखाने की चुनौती दी थी, लेकिन कोई ऐसा नहीं कर पाया.
चुनाव आयोग ने चुनौती देने वालों को मशीनों को खोलकर देखने की भी अनुमति दी थी. विशेषज्ञों का कहना है कि एक तो इवीएम मशीनें इंटरनेट से जुड़ी नहीं होती हैं और न ही इनमें ऐसा कोई प्रावधान होता है. इसलिए रिमोट या कोई एक कमांड देकर इनको कब्जे में नहीं किया जा सकता है.
दूसरे लाखों मशीनों को खोलकर उनमें हेरफेर करना संभव नहीं है, जबकि अंतिम समय तक यह पता नहीं होता कि कौन-सी मशीन कहां इस्तेमाल की जायेगी. सबसे गंभीर बात है कि इस बहाने चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को भी निशाना बनाया जा रहा है, जबकि चुनाव आयोग इवीएम पर लोगों का भरोसा कायम रखने के लिए सारे सवालों का जवाब दे रहा है, सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुला रहा है. बावजूद इसके कुछेक राजनीतिक दल इसको तूल दे रहे हैं. वे जब भी चुनाव हारते हैं, तो जिम्मेदार इवीएम को ठहरा देते हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीतिक दल चुनाव हार जाने के बाद मूल मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाते हैं.
यह दिलचस्प है कि जो पार्टी जीतती है, वह इसके पक्ष में खड़ी हो जाती है और जो हारती है, वह इसके विरोध में. आम आदमी पार्टी की दिल्ली विधानसभा चुनावों में इसी इवीएस से भारी जीत हुई थी, तब उसे इससे कोई शिकायत नहीं थी. ज्यों ही दिल्ली नगर निगम और पंजाब का चुनाव हारी, तो आम आदमी पार्टी को इसमें खामियां नजर आने लगीं. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद बसपा और सपा ने हार का जिम्मेदार इवीएम को ठहरा दिया था.
हम सबने देखा है कि चुनाव के पहले यादव कुनबे में कितना सर फुटव्वल हुआ थी. उनकी हार का एक बड़ा कारण कुनबे की लड़ाई भी थी, लेकिन जब हार की वजह की बात आयी, तो अखिलेश यादव ने इवीएम पर संदेह जताया, लेकिन जब गोरखपुर, फूलपुर और कैराना उपचुनावों भारी जीत मिली, तो उन्होंने इवीएस की तारीफ में एक शब्द नहीं कहा.
कर्नाटक में भी विपक्ष की सरकार इसी इवीएम के माध्यम से बनी. गुजरात में भी इसी इवीएम के माध्यम से विपक्ष ने भाजपा को नाकों चने चबवा दिये थे. तब इस मशीन की विश्वसनीयता पर किसी ने एक शब्द नहीं कहा था. यह दलील कैसे चलेगी कि जब आप जीतें, तो मशीन ठीक और जब हारें तो मशीन खराब है?
पुराना भाजपा नेतृत्व भी इवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठा चुका है. 2009 में लोक सभा चुनावों में हार के बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने इवीएम पर सवाल उठाये थे. आडवाणी ने मतपत्रों की वापसी की मांग तक की थी और पार्टी ने इसके खिलाफ एक अभियान भी चलाया था. भाजपा नेता जीवीएल नरसिम्हाराव ने तो 2009 में इवीएम के खिलाफ एक किताब ही लिख डाली थी, जिसका शीर्षक था ‘ डेमोक्रेसी एट रिस्क, कैन वी ट्रस्ट आवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन’ यानी लोकतंत्र खतरे में है, क्या हम अपनी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर भरोसा कर सकते हैं?
इस किताब की भूमिका लालकृष्ण आडवाणी ने लिखी थी. सुब्रमण्यम स्वामी तो इस मामले में सुप्रीम कोर्ट तक गये थे. इसी जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में वीवीपैट वाली इवीएम के इस्तेमाल का आदेश दिया था.
समय-समय पर अन्य दल भी अपनी सहूलियत के अनुसार इस पर अपना रुख बदलते रहे हैं. कांग्रेस में दिलचस्प स्थिति है. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी नेताओं का कहना है कि उनका इवीएम पर भरोसा नहीं है.
दूसरी ओर उन्हीं की पार्टी के नेता और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टर अमरिंदर सिंह को इवीएम की शिकायत करते आप ने कभी नहीं सुना होगा. एक तर्क दिया जाता है कि यूरोप के देशों में अब भी मतपत्र की व्यवस्था जारी है. ये सभी छोटे-छोटे मुल्क हैं, जिनकी जनसंख्या हमारे एक बड़े राज्य से भी कम हैं.
साथ ही इन देशों में बूथ लूटने और अन्य चुनावी धांधलियों जैसी कोई समस्या नहीं है. चुनाव आयोग के अनुसार भारत में 81 करोड़ से अधिक मतदाता हैं. यह संख्या अमेरिका, यूरोप के सभी मतदाताओं मिला दें, तो उनसे भी ज्यादा है. हमारी चुनौतियां एकदम भिन्न हैं. इसलिए नेताओं को चाहिए कि इवीएम पर बेवजह के सवाल उठाने तत्काल बंद करें, ताकि जनता के मन में कोई संशय पैदा न हो.
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