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Home Opinion रिश्तों में आदर रहे

रिश्तों में आदर रहे

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दोपक्षों के बीच सार्थक संवाद और सहभागिता के लिए साझे हितों और उद्देश्यों का सम्मान आवश्यक है. भारत और अमेरिका के रक्षा तथा विदेश मंत्रियों की बहु-प्रतीक्षित ‘टू प्लस टू’ वार्ता की सफलता इसी पर निर्भर है. आरंभिक संकेत सकारात्मक हैं. इस वार्ता से पहले अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जानेवाली 30 करोड़ डॉलर की सैन्य मदद रोक दी है.

इससे इंगित होता है कि आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान से जुड़ीं भारत की चिंता से अमेरिका एक हद तक सहमत है. इस घोषणा को अमेरिका की हालिया ‘हिंद-प्रशांत’ नीति की राह में एक पहल के रूप में भी भारत देख सकता है. पाकिस्तान की साझेदारी में चीन एशिया-प्रशांत क्षेत्र में ‘वन बेल्ट वन रोड’ परियोजना के सहारे आर्थिक-सामरिक दबदबे की जुगत में है. इस गठजोड़ को लक्ष्य कर अमेरिकी विदेश सचिव माइक पोम्पियो ने जुलाई में स्पष्ट कहा था कि अमेरिका इस इलाके से नहीं डिगेगा और यहां ऐसे किसी भी देश का विरोध करेगा, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में खुलेपन, आपसी सहयोग तथा मुक्त आवाजाही की राह रोके. यह सोच भारतीय हितों के अनुकूल है.

जून में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संकेतों में कहा था कि अपनी परियोजना के लिए चीन साथी देशों को जो बड़े-बड़े कर्ज देने के लालच दे रहा है, उससे सावधान रहने की जरूरत है. अमेरिकी रक्षा सचिव ने भी सहमति के स्वर में कहा था कि बड़े कर्जों से लदनेवाले देश अपनी आर्थिक संप्रभुता तथा स्वतंत्रता खो सकते हैं. लेकिन, भारत-अमेरिकी संबंधों की बेहतरी का एक पहलू इस बात पर निर्भर करता है कि अमेरिका आर्थिक मोर्चे पर अपनी संरक्षणवादी नीतियों से इतर किस सीमा तक भारत की जरूरतों को तरजीह देने के लिए तैयार है.

अमेरिका को अपेक्षा है कि भारत ईरान से तेल का आयात बंद करे. भारत 25 फीसदी कच्चा तेल ईरान से खरीदता है. ऐसे में कोई वैकल्पिक व्यवस्था होने तक भारत इस आयात को रोकने की स्थिति में नहीं है. अमेरिका यह भी चाहता है कि भारत रूस से एस-400 मिसाइल केंद्रित रक्षा-प्रणाली खरीदने का सौदा न करे, लेकिन 40 हजार करोड़ के इस सौदे को अंतिम रूप देने की दिशा में भारत आगे बढ़ चुका है. रूस पर भी अमेरिकी प्रतिबंध लगे हुए हैं.

उसकी मंशा है कि भारत इन प्रतिबंधों में सहायक सिद्ध हो और इसके लिए वह दबाव डालने पर भी कोशिश कर रहा है. पर, अमेरिकी दबाव में ऐसा करने से भारत के अपने आर्थिक और सामरिक हितों को चोट पहुंचने की संभावना है. ऐसे में भारत ने उचित ही अमेरिका को याद दिलाया है कि भारत के साथ उसके सामरिक संबंधों की भी बहुत अहमियत है.

भारत भी इन संबंधों को मजबूत होते देखना चाहता है, किंतु इसके एवज में वह न तो अन्य देशों से पूरी होनेवाली अपनी ऊर्जा और सैन्य जरूरतों की बलि दे सकता है, और न ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपने हितों को किसी एक देश के संदर्भ में सीमित कर सकता है.

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