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Home Opinion डिप्लोमेसी को चाहिए उदार दृष्टि

डिप्लोमेसी को चाहिए उदार दृष्टि

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आलोक कुमार गुप्ता
एसोसिएट प्रोफेसर, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार, बोधगया
akgalok@gmail.com
भारतीय क्रिकेटर से बने राजनेता नवजोत सिंह सिद्धू का पाकिस्तानी प्रधान मंत्री इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के दौरान वहां के सेना प्रमुख जनरल बाजवा को गले लगाना एक अपराध की तरह पेश किया जा रहा है और मीडिया में कई प्रकार से चर्चित है. सिद्धू भी प्रेस कांफ्रेंस कर सफाई देने का प्रयास कर रहे हैं.
गौरतलब हो कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में न तो कोई देश स्थायी मित्र होता है, न ही स्थायी दुश्मन. बदलते परिवेश में दोस्त और दुश्मन अपने राष्ट्रहित के अनुसार बदलते रहते हैं. विदेश नीति भी इस तथ्य के इर्द-गिद ही घूमती है. राष्ट्रों द्वारा अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मजबूत और दुरुस्त करने हेतु विदेश नीति के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहने की जरूरत होती है. राष्ट्रहित प्रत्येक राष्ट्र के लिए सर्वोपरि होता है और इसे लगातार बढ़ाते रहने के लिए सभी राष्ट्र प्रयासरत रहते है. इस प्रक्रिया में साम, दाम, दंड और भेद सभी का सहारा लिया जाता रहा है. हमारे कौटिल्य ने भी यही सुझाया है.
हम भूगोल बदल नहीं सकते और न ही पडोसी. सभी पड़ोसियों में पाकिस्तान के साथ हमारे संबंध सदैव उतार-चढ़ाव से ग्रसित रहे हैं और आगे भी रहेंगे.
प्रत्येक प्रधानमंत्री के काल में पाकिस्तान द्वारा युद्ध या फिर युद्ध जैसी स्थिति पैदा करने के प्रयास किये जाते रहें हैं. भारत दक्षिण एशिया में क्षेत्रफल और आर्थिक दृष्टिकोण से सबसे बड़ा राष्ट्र है और इसका व्यक्तित्व एक शांतिप्रिय राष्ट्र का रहा है. ऐसे में पाकिस्तान के साथ शांतिपूर्ण संबंधों को कायम करने हेतु हम लगातार प्रयासरत रहे हैं.
पाकिस्तान के साथ संबंधों को मधुर बनाने हेतु नाना प्रकार के रास्ते भी अपनाये जाते रहे हैं. ऐसे में भारत के राजनेताओं को जहां सिद्धू के प्रयासों को तहे दिल से सराहने की जरूरत थी इस पर भी सियासी खेल खेलने लगे.
यह भारतीय राजनीति का शायद सबसे गंदा दौर चल रहा है. अभी-अभी समावेशी राजनीति के अजातशत्रु कहे जाने वाले अटलजी गुजरे. उनके ही दल के लोगों को अटल जी के द्वारा विदेश नीति में किये गये सफल प्रयासों से सीख लेने की जरूरत थी. अगर कांग्रेस सरकार के नरसिम्हा राव ने विपक्ष में बैठे अटलजी की सेवाओं का राष्ट्रहित में सदुपयोग किया था, तो वर्तमान सरकार को भी सिद्धू सरीखे नेताओं की सेवाओं से गुरेज करने की क्या जरूरत थी?
जरूरत थी, तो इस पर हाय तौबा मचाये बिना सिद्धू जैसे क्रिकेटरों की, जिनके क्रिकेटर से प्रधानमंत्री बने इमरान खान के साथ दोस्ताना संबंध हैं, सेवाओं का अमन कायम करने हेतु भरपूर उपयोग करते. क्या किसी भारतीय को सिद्धू के राष्ट्र-प्रेम या राष्ट्रवादी होने पर शक हो सकता है?
विदेश नीति में राजनय के कई श्रोत निर्धारित है और उनका भरपूर उपयोग किया जाता है, जिसे हम ‘ट्रैक वन’, ट्रैक टू’ और ट्रैक थ्री’ इत्यादि डिप्लोमेसी के नाम से जानते है और इसका उपयोग दूसरे राष्ट्रों में ‘सिक्यूरिटी कम्युनिटी’ बनाने हेतु किया जाता है.
मसलन पाकिस्तानी क्रिकेटर, गायक और फिल्म जगत के कलाकार जैसी शख्सियत भारत के लिए पाकिस्तान के अंदर ‘सिक्यूरिटी कम्युनिटी’ की भूमिका अदा कर सकते है और वैसे ही भारत के ऐसे लोग भारत के अंदर पाकिस्तान के लिए ‘सिक्यूरिटी कम्युनिटी’ का कार्य कर सकते है.
सिक्यूरिटी कम्युनिटी स्वहित और राष्ट्रहित दोनों से प्रेरित होती है और जिनका कार्य होता है राजनय के ऐसे चैनलों को खोलना, जिनके मार्फत स्थिर विदेश नीति को गतिशीलता प्रदान हो. इनके माध्यम से भी दो राष्ट्रों के बीच ‘डैड-लॉक’ की स्थिति को समाप्त करते हुए संवाद के रास्ते दुरुस्त किये जाते है.
विदेश-नीति में ऐसे लोगो की भूमिका अहम होती है.यह सोंचने की बात है कि कभी यासिर अराफात अमेरिका और इस्राइल के लिए एक इनामी आतंकवादी घोषित थे और एक समय ऐसा आया जब शांति-वार्ता मुकम्मल हुई और अमेरिकी एवं इस्राइली प्रधानमंत्री के साथ उन्होंने ने मंच साझा किया और तीनों द्वारा के दूसरे के हाथ पकड़ी हुई मुद्रा की छवि सभी समाचार-पत्रों के फ्रंट-पेज पर सुशोभित हुए.
राजनय का इससे बड़ा और उम्दा उदाहरण नहीं हो सकता. सिद्धू ने भी सही कहा, जिस मुशर्रफ ने कारगिल को अंजाम दिया, अटलजी ने उसे आमंत्रित कर विश्व समुदाय को अपने बड़े दिल और परिपक्व राजनीति का नायब नमूना पेश किया. शांति-दूत बन भारतीय परंपरा का निर्वाह किया.
रक्षाबल और राष्ट्र के सीमाओं के प्रहरियों के बलिदानों को कोई राजनेता तो क्या आम नागरिक भी नकार नहीं सकता, बल्कि तहे दिल से शुक्रगुजार और नतमस्तक होता है.
उनका बलिदान किसी प्रशंसा का मुहताज नहीं, अतुलनीय होता है, परंतु पड़ोसियों के साथ अगर संबंध कड़वे और कटु बने रहे, तो ऐसे में हमारे प्रहरी भी असुरक्षित होते हैं. ऐसे में सत्ता-दल और विपक्ष दोनों को ऐसे प्रयास करने की जरूरत होती है, जहां से सीमाओं पर शांति के रास्ते दुरुस्त हो सकें. राजनय और कुटनीति की यही जिम्मेदारी होती है. जहां डेड-लॉक किस स्थिति बनी हो, वहां सबसे ज्यादा राजनय की जरूरत होती है. राजनय अक्सर धागे जैसे पतली पगडंडियों पर चलकर शांति कायम करने हेतु स्थान बनाने और उसे आगे बढ़ाने की प्रक्रिया है.
सिद्धू के कृत्य को इसी परिप्रेक्ष्य में समझने और विश्लेषित करने की जरूरत है. राष्ट्रहित में दलगत और सत्ता-संघर्ष से ऊपर उठकर सरकार को सिद्धू जैसे और भी लोग ढूंढने चाहिए और कुटनीति हेतु उनकी सेवाओं का लाभ लेना चाहिए. उनको समझना चाहिए की हम या हमारी सेना कभी इस्लामाबाद तक मार्च नहीं कर सकते, युद्ध विनाशकारी होता है, तो शांति और शांति के रास्ते से परहेज क्यों करें?
यह भारतीय सियासत की त्रासदी है कि हम दलगत राजनीति और सत्ता-लोलुपता में पूर्णत: अंधे हो रहे है. राष्ट्रहित सत्ता-संघर्ष की बलिवेदी पर शहीद हो रही है. सत्ता-दल का संसदीय बहुमत में होना ही उचित समय है जब राजनीति परिपक्व हो सकती है.
मोदीजी ने भी सत्ता में आते ही ‘नेबरहुड फर्स्ट’ यानि ‘पड़ोस पहले’ की विदेश-नीति का आगाज किया था. अगर पड़ोस में ही शांति न हो, तनाव की जैसी स्थिति बनी रहे, तो ऐसे में आर्थिक एवं सांस्कृतिक हित भी बड़े तौर पर प्रभावित होते हैं. पाकिस्तान कभी हमारा ही अंग रहा है.
अत: साझा-विरासत के नाते भी भारत-पाकिस्तान संबंधों में शांति कायम करने हेतु प्रयास से भारत छोटा नहीं बन जायेगा.
वर्तमान में राजनय की यही मांग है कि हम सिद्धू के प्रयासों को स्वीकार करें तथा उन्हें और उन जैसे लोगों को भी ज्यादा-से-ज्यादा शामिल कर विदेश-नीति में एक प्रयोग किया जाए. इमरान खान भारत के लिए एक अवसर हैं, चुनौती नहीं.
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