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जरूरतमंदों की मदद कर मनाएं ईद

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शफक महजबीन

टिप्पणीकार

mahjabeenshafaq@gmail.com

ईद-अल-अजहा यानी ‘कुर्बानी की ईद’ मुसलमानों के लिए उनके खास त्योहारों में से एक है, जिसे दुनियाभर में बहुत अदब और एहतराम के साथ मनाया जाता है. यहां आम बोलचाल में इसे ‘बकरीद’ भी कहा जाता है.

दरअसल, इसे कुर्बानी की ईद इसलिए कहते हैं, क्योंकि इस दिन सुबह में नमाज-ए-ईदैन के बाद मुसलमान अल्लाह की राह में अपने पाले-पोसे जानवरों की कुर्बानी देते हैं.कुर्बानी देने के पीछे एक बड़ा ही तवील वाकया है, जिसे यहां बयान कर पाना नामुमकिन है.

उस वाकये का खास पहलू यह है कि पैगंबर हजरत इब्राहिम अल्लाह के हुक्म पर अपने सबसे महबूब यानी अपने बेटे इस्माइल को कुर्बान करने के लिए ले गये. बेटे का मासूम चेहरा देखकर हजरत इब्राहिम का इरादा बदल न जाये, इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली और छुरी चला दी, पर जैसे ही आंखों से पट्टी हटायी, तो देखा कि इस्माइल को खरोंच तक नहीं आयी है.

इस्माइल सही-सलामत पास खड़े थे और अल्लाह ने उनकी जगह एक दुम्बा (बकरे जैसा जानवर, जिसकी दुम चक्की-पाट जैसी गोल और भारी होती है) रख दिया था. तभी से ईद-अल-अजहा के दिन हलाल जानवर की कुर्बानी देने की रवायत शुरू हुई.

इस त्योहार का पैगाम यही है कि इसके जरिये लोगों में अपनी सबसे अजीज चीज को अपने रब के लिए कुर्बान करने का जज्बा पैदा होता है. सही मायने में यह त्योहार एक तरह से त्याग का प्रतीक है.

यूं तो ईद का मतलब खुशी होता है, लेकिन ईद-अल-अजहा का मतलब सिर्फ खाना-पीना, मिलना-जुलना और खुशी मनाना ही नहीं है, बल्कि अपनी प्यारी चीज, जिसे किसी को देने या छोड़ने का मन न करे, उसे अल्लाह की राह में कुर्बान कर देना है.

इसे ही त्याग की संज्ञा दी जाती है. इसके समाजी पहलू को देखें, तो त्याग के रूप में इस दिन हमें अपने अंदर की तमाम बुराइयों को छोड़ने का संकल्प लेना चाहिए. जैसे झूठ बोलना, नशाखोरी, चुगली करना, किसी को नीचा दिखाना, हिंसा करना, घमंड करना आदि.

अगर कोई मुसलमान इन बुरी आदतों में से इस दिन अपनी एक भी आदत हमेशा के लिए छोड़ने का संकल्प लेता है, तो कुछ साल में उसकी सारी बुरी आदतें खत्म हो जायेंगी और उस पर अल्लाह की रहमत बरसेगी.

आजकल केरल में आयी भीषण बाढ़ से हजारों लोग बेघर हो गये हैं और सैंकडों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है.

बाढ़ की वजह से लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया ने देश के सभी मुसलमानों से यह अपील की है कि त्योहार पर खर्च होनेवाले अपने बजट का दस फीसदी हिस्सा बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए राहत कोष में जरूर भेजें.

यह एक अच्छी और नेक पहल है. ऐसा करके हम अल्लाह के बंदों की ही मदद करेंगे और सही मायने में तभी हमें ईद-अल-अजहा की असल खुशी हासिल होगी. ईद की नमाज के बाद हम यह दुआ भी करें कि अल्लाह हमें ऐसी मुसीबतों से बचाये और हम सभी पर अपनी रहमत बरसाये.

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