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नागरिकता पर राजनीति

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राष्ट्रीय नागरिक पंजी के अंतिम मसौदे में लगभग 40 लाख लोगों के सामने वैधानिक अस्तित्व का संकट आ गया है. इन लाखों लोगों के मन में यह डर होना स्वाभाविक है कि कहीं उन्हें ‘अवैध आप्रवासी’ न करार दिया जाये. अभी भी विकल्प शेष हैं. जो लोग पंजी में नाम दर्ज नहीं करा सके हैं, वे सात अगस्त से फिर आवेदन दे सकेंगे. तकनीकी गलतियों के सुधार के लिए भी 28 सितंबर तक का समय है. जिन्हें आवेदन के बावजूद पंजी में जगह नहीं मिली है, वे अपनी शिकायत भी दर्ज करा सकते हैं.
पंजी के अंतिम प्रकाशन के बाद भी ट्रिब्यूनल में अपील करने की राह खुली रहेगी. यह पूरी प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में चल रही है. चूंकि यह गंभीर रूप से संवेदनशील मानवीय मसला है, इस बाबत चल रही गैरजिम्मेदाराना राजनीतिक बयानबाजी सही नहीं है. एक वैधानिक कार्यक्रम को लेकर सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियां एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप के जरिये स्वार्थ-सिद्धि में लगी हुई हैं.
एक लोकतांत्रिक देश में कायदे से यह होना चाहिए था कि सभी दल इसमें सकारात्मक योगदान देते और यह सुनिश्चित करने पर ध्यान देते कि किसी चूक या लापरवाही से किसी योग्य नागरिक का नाम पंजी से बाहर न हो. उन्हें लोगों की शिकायतों तथा तकनीकी खामियों को दूर करने में मददगार की भूमिका निभानी चाहिए. सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को फिर से साफ किया है कि यह पंजी अभी मसौदा है और उसने केंद्र सरकार से पंजी से बाहर के लोगों की शिकायत की सुनवाई करने की प्रक्रिया 16 अगस्त तक मांगी है.
अदालत ने पंजी में शामिल नहीं हुए लोगों के साथ किसी भी तरह के दबाव के व्यवहार की मनाही की है. माहौल को शांत रखने की जवाबदेही सरकार पर तो है ही, पर अन्य दलों को भी इस जिम्मेदारी को वहन करना चाहिए. पक्ष-विपक्ष के नेतागण गैरजरूरी बयान तो दे ही रहे हैं, संसद में भी हंगामा हो रहा है. इस मुद्दे की गंभीरता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि दुनिया में करीब 97 ऐसे देश हैं, जिनकी आबादी 40 लाख से कम है. राष्ट्रीय नागरिक पंजी को सही और संतुलित तरीके से तैयार करना एक बड़ी चुनौती है. जो लोग अंततः नागरिक नहीं माने जायेंगे, उनके बारे में भी एक राय बनाने की समस्या है.
यह भरोसा रखा जाना चाहिए कि न्यायालय की निगरानी में इस पूरी प्रक्रिया में कानूनी और इंसानी पहलुओं का ध्यान रखा जायेगा तथा नाइंसाफी से बचने की हरसंभव कोशिश की जायेगी. लोकतंत्र, संविधान और मानवाधिकारों के लिए प्रतिबद्धता जतानेवाले राजनीतिक दलों, चाहे वे सरकार में हों या विपक्ष में, यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वे मुद्दे और माहौल की नजाकत को समझते हुए ही अपनी कथनी और करनी को अंजाम देंगे. पंजी को अंतिम रूप देने में अभी वक्त है और उससे पहले नाम जोड़ने और कमियों को दूर करने के मौके भी हैं. तनातनी और तल्खी से इस कवायद में खलल ही पड़ेगा.
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