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सबसे ज्यादा अश्लील है भ्रष्टाचार

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सबसे ज्यादा अश्लील है भ्रष्टाचार
मोहन गुरुस्वामी
वरिष्ठ टिप्पणीकार
mohanguru@gmail.com
भ्रष्टाचार भारत में बातचीत का एक पसंदीदा विषय है. इस पर चर्चा करना हम पसंद करते हैं और इसकी सभी विकृतियों का रोना रोते हैं. हमें इसमें महारत हासिल है और हम सभी ने किसी न किसी रूप में इसे अनुभव किया है. यह किसी एक सहज परिभाषा को नकारता है, लेकिन यह है क्या, हम सभी समझते हैं. अश्लीलता के संदर्भ में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पॉटर स्टिवर्ट का कथन है- ‘मैं इसे जानता हूंं जब इसे देखता हूं’- यह कथन पूरी तरह भ्रष्टाचार के साथ लागू होती है. भ्रष्टाचार तमाम अश्लीलताओं में सबसे ज्यादा अश्लील है, लेकिन एक सामान्य बात है.
अर्थशास्त्री जब भ्रष्टाचार की बात करते हैं, तो इसके लिए एक भिन्न शब्द ‘आर्थिक खरोंच’ (इकोनॉमिक रेंट) को तरजीह देते हैं. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की परिभाषा के मुताबिक, ‘यह किसी व्यक्ति को मानवीय चतुराई के चलते सीमित किसी उपयोगी वस्तु के लिए दी गयी अतिरिक्त राशि होती है.’ साफ है कि इस परिभाषा में नैतिक आयाम नदारद है. लेकिन, तब समस्या और जटिल हो जाती है, जब हम पाते हैं कि नैतिक आयाम बहुत लचीला और विविधरंगी है.
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राज्यसभा के सदस्य हैं. वह हितेश्वर सैकिया के किरायेदार हैं, असम में गुवाहाटी निवासी हैं. लेकिन हम जानते हैं कि यह सत्य नहीं है, और यह कि वे नयी दिल्ली में रहते आये हैं. एलके आडवाणी भ्रमणशील रहे हैं. एक बार राज्यसभा सीट के लिए उन्होंने खुद को उज्जैन निवासी घोषित किया था. अभी वे अहमदाबाद के निवासी हैं.
इसी तरह अरुण जेटली दिल्ली वाले हैं, लेकिन साल 2014 में वे अमृतसर गये और घर खरीदकर बसने की घोषणा की थी. अमृतसर के लोगों ने उन्हें पसंद नहीं किया, अतः अब वे अहमदाबाद निवासी हैं. लेकिन, अगर आप और मैंने, मान लें कि पासपोर्ट के लिए, इन नेताओं की तरह पते की घोषणा की होती, तो हम जेल में होते.
आर्थिक खरोंच अन्य रूप ग्रहण कर लेता है, जो सामान्यतः वस्तु पर अधिक टैक्स लगाता है. मसलन, ऊंचे आयात करों का अर्थ वास्तव में आयात रोकना, कीमतें बढ़ाना तथा घरेलू निर्माताओं को लाभ पहुंचाना है. हिंदुस्तान अम्बेस्डर अपने निर्माताओं एवं कर्मचारियों को जितना सुख देता है, उतना ही दुख इन कारों के मालिकों और चलानेवालों को देता है.
क्या आपने ध्यान दिया है कि सभी कार टायरों की कीमतें लगभग वही होती हैं? एडम स्मिथ ने इसकी बेहतर व्याख्या की है कि, ‘समान व्यापार करनेवाले लोग कभी-कभार आमाद-प्रमोद या भटकाव सुख के लिए मिलते हैं, लेकिन बातचीत का अंत जनता के विरुद्ध किसी साजिश से होता है.’
ये साजिशें राजनेताओं व नौकरशाहों के बिना सक्रिय सहयोग के कामयाब नहीं हो सकतीं. हमारे सांसदों में एमपीएलएडी (सांसदों की स्थानीय क्षेत्र विकास योजना) जगाने के लिए के डॉ मनमोहन सिंह के प्रति धन्यवाद का भाव है. लेकिन, तत्कालीन वित्त मंत्री ने शायद ही कभी साक्षी महाराज जैसे पूज्य के बारे में सोचा हो, जिन्होंने योजना को निजी विकास योजना में बदल दिया.
जब एक पुलिसवाला प्राथमिकी दर्ज करने के लिए अथवा बिना किसी तार्किक कारण के पैसे लेता है, तब यह एक भिन्न वर्ग से संबंधित होता है और हम सच में गुस्सा होते हैं. हममें से जिन लोगों ने दिल्ली में बिना अधिकारियों के अनुमोदन के मकान बनाया या उनमें बदलाव किये, यह जानते हुए कि यह नियम के विरुद्ध है, तो इसके लिए उसने भुगतान किये.
यह सामान्य बात थी, जो इसे बिल्कुल जायज ठहराती प्रतीत हुई. लेकिन, जब उच्च न्यायालय ने उन्हें ध्वस्त करने के आदेश दिये तब हम आक्रोशित थे. यदि वही उच्च न्यायालय आदेश देता है कि अपने निवास स्थान को लेकर गलत विवरण देनेवाले सांसदों को खाली कर देना चाहिए, क्या तब भी हम आक्रोशित होंगे? हम प्रसन्न हो सकते हैं, लेकिन आक्रोशित नहीं. स्पष्टतः यह ऐसा विषय है, जिस पर व्यापक विचार-विमर्श और चर्चा की आवश्यकता है. इसमें संसद आत्मविश्लेषण के जरिये बहुत कुछ कर सकती है. अनेक हैं भी, जो इस विषय के विशेषज्ञ हैं.
कई मत सर्वेक्षण दिखाते हैं कि कुछ ऐसे पेशे हैं, जिन्हें हम लगभग पूरी तरह भ्रष्ट मानते हैं. राजनेता और पुलिस के लोग इस सूची में शिखर पर हैं. सर्वेक्षण में मत देनेवाले 99 फीसद ने उन्हें धूर्त होना माना है. रोजमर्रा के जीवन में हम प्रायः जिस भ्रष्टाचार के गवाह बनते हैं, ये उनकी गैरजरूरी कोशिशों के नतीजे हैं.
ऐसा नहीं है कि दूसरी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं में भ्रष्टाचार नहीं होता. भ्रष्टाचार पूरी तरह व्याप्त एक विश्वव्यापी परिघटना है. यह प्रकृति के साथ अंतर्निहित होता है. जैसे जानवर एक-दूसरे से भोजन चुराते हैं, मनुष्य वैसे ही दूसरों से पैसे ऐंठते हैं. लेकिन मनुष्य संगठित समाज में रहता है और समाज नियमों पर आधारित एक व्यवस्था है.
कानून के काम करने के लिए स्पष्ट होना चाहिए कि यदि पकड़े गये, तो तेज सुनवाई होगी और दोषी पाये जाने पर सजा मिलेगी. यहीं पर, हमारे पास गंभीर समस्याएं हैं. कानून कौन बनाता है? राजनेता बनाता है. कानून लागू कौन करता है? पुलिस लागू करती है. पर दोनों ही अत्यधिक भ्रष्ट समझे जाते हैं.
(अनुवाद : कुमार विजय)
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