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रेल में लापरवाही

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भले ही देश में बुलेट ट्रेन परियोजना शुरुआती चरण में हो, पर भारतीय रेल के दस्तावेजों में यह ट्रेन पटरी पर दौड़ रही है. नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) ने अपनी जांच में पाया है कि एक एक्सप्रेस ट्रेन ने 409 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से महज 17 मिनट में इलाहाबाद और फतेहपुर के बीच की दूरी तय कर दी. रेलवे सूचना प्रणाली में कुछ अन्य ट्रेनों के संचालन की जानकारी भी गलत दी गयी है. ऐसी गड़बड़ियों से यात्रियों को ट्रेनों के आवागमन की गलत जानकारी मिलती है.

बीते कुछ सालों से ट्रेनों के समय पर न चलने की समस्या भी लगातार गंभीर होती जा रही है. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में रेल प्रबंधन की अन्य नीतिगत और व्यावहारिक खामियों को भी रेखांकित किया है. एक बड़ा सवाल डीजल इंजनों के निर्माण में बड़े निवेश पर है. रेल विभाग 2021 तक पूर्ण विद्युतीकरण की दिशा में कार्यरत है. ऐसे में इन डीजल इंजनों की क्या उपयोगिता रह जायेगी, जिन पर 17 हजार करोड़ रुपये से अधिक निवेशित किया जाना है?

यह मसला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि खुद रेलवे ने मौजूदा इंजन निर्माण क्षमता में कटौती का भी निर्णय लिया है. यदि तीन सालों में सौ फीसदी बिजली प्रणाली लाने का इरादा पूरा नहीं भी होता है, तब भी यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि अहम और व्यस्त रास्तों पर बिजली के इंजन चलने लगेंगे.

जमीन के ब्योरे, पार्किंग की आमदनी, यात्रियों की सुविधाओं आदि के बारे में रेल विभाग के नकारात्मक रवैये को भी सीएजी ने रेखांकित किया है. दिल्ली से कई शहरों के बीच प्रीमियम ट्रेन किराये हवाई जहाज से भी महंगे हैं. इससे यात्रियों की संख्या पर असर पड़ रहा है और जो यात्री ट्रेनों से आवाजाही कर रहे हैं, उन्हें समुचित सुविधाएं नहीं मिल रही हैं. लोग प्रीमियम ट्रेनों की जगह मेल और एक्सप्रेस को चुन रहे हैं. रेल की जमीन और पार्किंग आदि के कुप्रबंधन से भी रेल राजस्व को नुकसान हो रहा है.

नोटबंदी के बाद निजी टिकट विक्रेताओं द्वारा जमा करायी गयी नकदी को लेकर भी सीएजी ने सवाल उठाया है. रेल आवाजाही और माल ढुलाई का प्रमुख साधन होने के साथ एक बड़ा सार्वजनिक उपक्रम भी है. यह कमाई, यातायात और रोजगार के मद्देनजर अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है. पर्यटन और तीर्थाटन तथा यात्रा-अनुभवों के कारण इसका सांस्कृतिक महत्व भी है. देशभर में बिछीं 65 हजार किमी लंबी पटरियों पर 19 हजार रेलगाड़ियां दौड़ती हैं.

इसके 1219 में से करीब 40 फीसदी सेक्शन अपनी क्षमता से दोगुना यातायात संचालित कर रहे हैं. वर्ष 1950 से 1916 के बीच यात्री यातायात में 1,344 और ढुलाई यातायात में 1,642 फीसदी बढ़त हुई है, जबकि नेटवर्क मात्र 23 फीसदी ही बढ़ सका. यदि इसके संचालन और प्रबंधन में गंभीर चूकों तथा नीतिगत खामियों पर सीएजी जैसी संस्था सवाल उठाती है, तो सरकार को तुरंत उन सवालों के हल के लिए ठोस पहलकदमी करना चाहिए.

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