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हिंसक भीड़ पर लगाम

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देश के विभिन्न हिस्सों में भीड़ के हाथों हो रही लगातार हत्याओं को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने पहलकदमी की है. गृह सचिव की अध्यक्षता में बनी एक समिति चार सप्ताह के भीतर सुझाव देगी और गृह मंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रिमंडलीय समिति उन सुझावों को लागू करने का खाका तैयार करेगी.
इस कदम का एक संकेत यह है कि हत्यारी भीड़ के मसले पर सरकार गंभीर है और वह इसे रोकने पर विचार कर रही है. इस पहल में देरी हुई है, पर अब उम्मीद भी बंधी है. अभी तक केंद्र सरकार कहती रही थी कि कानून-व्यवस्था की बहाली का जिम्मा राज्य सरकारों का है. हालांकि भीड़ द्वारा की जा रही हत्याओं की सिलसिलेवार वारदातों पर केंद्र सरकार चिंता जताती रही थी, लेकिन अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखायी गयी.
इस मसले पर कुछ दिन पहले दिये गये सर्वोच्च न्यायालय की कानून बनाने और कदम उठाने की सलाह के बाद तो केंद्र कम-से-कम राज्यों से हिंसक भीड़ पर अंकुश लगाने के उपायों पर जवाब-तलब तो कर ही सकता था. इन घटनाओं पर भड़काऊ बयानबाजी करनेवाले और भीड़ को शह देनेवाले नेताओं को भी रोका जा सकता था. सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले साल सितंबर में ही राज्यों को निर्देश दिया था कि वे गोरक्षा के नाम पर हो रही हत्याओं को रोकने के लिए कठोर कदम उठाएं और सप्ताहभर के भीतर हर जिले में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को खास जिम्मेदारी दी जाये.
अब फिर से अदालत को ही हरियाणा, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश की सरकारों से पूछना पड़ा है कि उन्होंने इस मामले में अब तक क्या किया है. हत्यारी भीड़ के उन्मादी रवैये पर कुछ दिन पहले आये अदालती आदेश तथा संसद में इस पर सवाल उठाये जाने के बाद सरकार के पास सक्रिय होने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया था. सर्वोच्च न्यायालय ने बड़े तीखे तेवर के साथ केंद्र तथा राज्य सरकारों को याद दिलाया है कि ‘भीड़तंत्र का भयावह कृत्य’ किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता है, ‘डर और अराजकता के माहौल में राज्यसत्ता को सक्रियता दिखाते हुए कदम’ उठाने होते हैं, इसलिए हत्यारी भीड़ पर लगाम कसने के लिए ‘अलग से एक कानून’ बनाने की जरूरत है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2014 से इस साल तीन मार्च तक 45 लोगों को गोरक्षा के नाम पर मारा गया है. चोरी की झूठी अफवाहों ने बीते छह माह में 26 से अधिक जानें ले ली हैं. विधि-विधान से चलनेवाला कोई भी सभ्य लोकतांत्रिक देश के लिए यह बेहद चिंताजनक है. यदि सरकारें ही ऐसी घटनाओं को रोकने में लापरवाही बरतेंगी, तो फिर गुहार की क्या जगह बचती है? अदालतें निर्देश ही जारी कर सकती हैं, पर पुलिस-प्रशासन अपने कर्तव्य को लेकर गंभीर नहीं हैं. बहरहाल, समस्या को लेकर अब जब केंद्रीय स्तर पर चूंकि समितियों का गठन हो चुका है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसी अराजक घटनाओं की पुनरावृत्ति को जल्दी ही रोका जा सकेगा.
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