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बारिश और हम

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कविता विकास
लेखिका
आकाश की नेमत जब धरती पर सुधा बनकर पड़ती है, तब ग्रीष्म की ताप से झुलसे हुए चर-अचर सभी जी उठते हैं. गगन करुणा का सागर है, जो सृष्टि के आरंभ से ही घन का धन देकर धरती की छाती को ठंडक पहुंचाता है. पशु-पक्षी, मनुष्य सभी का मन तृप्त हो जाता है. मेघ का दान अमोल है, क्योंकि इससे हमारी झोली भरती है.
वर्षा की बूंदें जब पृथ्वी के दिव्य देह पर थिरकती हैं, तो एक सुमधुर लय की संरचना होती है. कवि मन विकल हो जाता है. विरह का यह उद्वेग लोकगीतों में जीवित है- पिया तोरे मिलन की आस में/ रैना बीती जाये… बारिशों के त्योहार में मायके का मोह नवविवाहिता की आंखों से बहने लगता है, जब उसे झूले, घटाओं संग दौड़ लगाने की अल्हड़ यादें सताने लगतीं हैं.
लोकगीतों में बेटी का बाबुल के घर जाने की इच्छा देखिये- भैया बदरवा रे/ ले जा ले जा मोरा संदेश/ के बेटी है तोरा गहना… इन शाश्वत गीतों की रचना का संवाहक मेघ ही तो है.
मेघ खेतिहर संस्कृति के विधायक तत्व हैं. न बरसें तो नदी का हृदय बैठने लगता है. अखिल ब्रह्मांड जो जीवन, जगत और शून्य से बना है, तीनों का अस्तित्व जल से जुड़ा है. जल से जीवन है और जीवन से जगत. शून्य यानी आकाश. शून्य से जब मेघ बरसता है, तो तीनों के बीच संतुलन कायम करता है.
कृषकों के पसीने की एक-एक बूंद सोना बनती जाती है. बैलों के पैर सहजता से बढ़ते जाते हैं. वह वर्तमान की जमीन पर भविष्य का नींव रखता है. जैसे-जैसे बीज अंकुरित होकर पौधा बनता है, किसानों के सपने परवाज पाने लगते हैं. फसलों से जुड़ी हैं प्रिया के पांवों की महावर, बिटिया के देह की हल्दी और बेटे का खल्ली-स्लेट. उनका चूल्हा जलेगा, थाली महकेगी और जीवन उत्सव हो जायेगा.
अब जब यह तय है कि जब तक बारिश होगी, तब तक तो हमारी दुनिया थमी ही रहेगी एक जगह, तो क्यों न जहां हैं वहीं से हम इसका आनंद लें. आखिर बूंदें भी तो चाहती हैं कि थोड़ी देर रुककर उनके साथ जी लें. घर में हों तो बच्चों के साथ कागज की नाव चलायें, सबसे छुपकर भीग लें, जमे हुए पानी में छपकियां लगायें.
आज की बंद संस्कृति से थोड़ी देर निजात पा लें. कार्यालय में हों तो लैपटाप और मोबाइल से नजर हटाकर खिड़की से झांक लें. रिमझिम बारिश को आंखों में भरकर याद कर लें कॉलेज के वे दिन, कि तंग छाते के नीचे जब चार दोस्त आते नहीं थे, तब कैसे छतरी उड़ाकर पानी में भीगते हुए हॉस्टल की ओर दौड़ पड़ते थे. सड़क किनारे जामुन के पेड़ तले खड़े हों, तो कुछ बूंदें गालों पर टपक जाने दें. चीज वही है, स्थिति और स्थान बदल गये हैं. इस तरह भागती-दौड़ती जिंदगी में मुस्कुराने की वजह मिल जायेगी.
तनाव की परतों में दबी खुशहाल जिंदगी को बाहर की हसीन दुनिया में झांकने की मोहलत मिल जायेगी. महीने-दो-महीने में तो यह रुत बदल जायेगी, तो क्यों न कुछ समय के लिए ही बहते पानी की रवानी में मिल जायें. एक ही जगह जमा रहने से पंक भी जमा हो रहा था, वह भी धुल जायेगा. जिंदगी जीने का मजा आ जायेगा.
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