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‘नीट’ पर सवाल

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पुरानी खामियों को दूर करने के लिए नये सिरे से इंतजाम किये जाते हैं, लेकिन जब नये इंतजाम ही नयी खामियां खड़ी करने लग जाएं, तो सवालों का उठना स्वाभाविक ही है.

देश के मेडिकल और डेंटल कॉलेजों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पात्रता तय करने और प्रवेश देने की परीक्षा ‘नीट’ को इसकी मिसाल के तौर पर लिया जा सकता है. एमबीबीएस और बीडीएस पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने के पुराने चलन को दूर करने की नीयत से लायी गयी ‘नीट’ परीक्षा-व्यवस्था सवालों के घेरे में है. इस परीक्षा में भौतिकी, रसायन शास्त्र और जीव विज्ञान (जंतु और वनस्पति विज्ञान) से चार-चार अंकों के कुल 180 (प्रत्येक विषय से 45 प्रश्न) प्रश्न पूछे जाते हैं, साथ ही नकारात्मक अंकन का विधान है. सीटों की संख्या उम्मीदवारों की तुलना में बहुत कम है, सो, अपेक्षित यही है कि ‘नीट’ की परीक्षा के जरिये ज्यादा मेधावी और मेहनती परीक्षार्थियों का चयन होगा, लेकिन एक रिपोर्ट के निष्कर्ष इस अपेक्षा को झुठलाते हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ‘नीट’ में किसी विषय में उम्मीदवार को शून्य अंक हासिल हों, तो भी यह संभावना बनी रहती है कि किसी-न-किसी निजी संस्थान में उसका दाखिला हो जायेगा. वर्ष 2017 की ‘नीट’ परीक्षा में शून्य या नकारात्मक (निगेटिव) अंक हासिल करनेवाले 110 परीक्षार्थी निजी संस्थानों में एमबीबीएस में दाखिला लेने के योग्य करार दिये गये. कुल 400 परीक्षार्थी ऐसे थे, जिन्होंने परीक्षा के विषयों में से किसी एक में 10 या 5 से भी कम अंक हासिल किये, लेकिन उन्हें दाखिले के योग्य माना गया. पहली नजर में लग सकता है कि मामला भ्रष्टाचार का है, लेकिन सच्चाई इससे तनिक अलग है.

मसला प्रक्रियागत लापरवाही का है. ‘नीट’ के शुरुआती वक्त में विधान किया गया था कि सफल होने के लिए हर विषय में कम-से-कम 50 प्रतिशत अंक लाना अनिवार्य है, लेकिन बाद में यह विधान बदलते हुए 50 प्रतिशतक (परसेंटाइल) की व्यवस्था बनायी गयी. प्रतिशतक के जरिये यह जाना जाता है कि किसी अंकतालिका में कितने फीसद व्यक्ति एक निर्धारित अंक के ऊपर या नीचे हैं.

नीट परीक्षा में शामिल विषयों में से किसी एक विषय में शून्य या नकारात्मक हासिल करनेवाले परीक्षार्थियों का एमबीबीएस या बीडीएस के पाठ्यक्रम में दाखिल के लिए योग्य करार दिया जाना गणित के इसी खेल का नतीजा है. लेकिन, मसले को प्रक्रियागत लापरवाही का नमूना भर मानना ठीक नहीं है. इस बहाने की ओट भी छुपना ठीक नहीं है कि शिक्षा संविधान में समवर्ती सूची में है और शुरुआती तौर पर राज्यों ने ‘नीट’ सरीखी केंद्रीकृत परीक्षा प्रणाली को अपने अधिकारों का हनन माना था, सो उन्हें परीक्षा के मानक उनकी रजामंदी के हिसाब से तय किये गये.

दरअसल, शून्य या निगेटिव अंक लानेवाले ज्यादातर परीक्षार्थियों ने लाखों की फीस वसूलनेवाले निजी संस्थानों में दाखिला लिया है. ज्यादा चिंता की बात यही है. सोचना होगा कि क्या हम एक ऐसा मुल्क बनते जा रहे हैं, जहां डॉक्टरी सरीखी योग्यता रुपयों से खरीदी जा सकती है?

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