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Home Opinion चीन के दर्द को भारत का इलाज

चीन के दर्द को भारत का इलाज

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तरुण विजय

नेता, भाजपा

tarun.vijay@gmail.com

चीन में इन दिनों एक फिल्म ‘व पूश योशन’ की वहां के अखबारों में खूब चर्चा है. इसका अर्थ है- ‘मैं औषधियों का ईश्वर नहीं.’ यह फिल्म चीन के गरीब कैंसर रोगियों को भारत से सस्ती दर पर दवा लाकर बिना मुनाफे के देनेवाले समाजसेवी की संघर्षकथा है.

भारत की कैंसर-दवाएं अच्छी और सस्ती हैं, जबकि ब्रिटेन और अमेरिका से वही दवाएं 15 से 20 गुना महंगी होती हैं. लेकिन, भारत की दवाओं को चीन में बिकने की वैधानिक अनुमति नहीं है, अत: भारत की दवाएं यहां लाकर बेचना गैर-कानूनी है. इसलिए जब चीनी युवक लू योंग गरीब कैंसर रोगियों को भारत से चुपचाप दवाएं लाकर देने लगा, तो पश्चिमी देशों की दवा कंपनियों ने लू योंग के खिलाफ बौद्धिक संपदा की चोरी का मुकदमा दर्ज कर दिया.

यह फिल्म बहुत रोचक, भावपूर्ण तथा चीन के समाज में एक भिन्न स्तर के संघर्ष का सशक्त चित्रण करती है. आशा करनी चाहिए कि भारत का सूचना प्रसारण मंत्रालय चीन सरकार के सहयोग से यह फिल्म भारत में दिखाने का आयोजन करेगा. फिल्म की कथा का निरुपण सत्यकथा पर आधारित है और करोड़ों चीनियों के हृदय को छूनेवाला है.

किस प्रकार चीन के कैंसर रोगी संगठित होकर लू योंग के पक्ष में अदालत में याचिका दायर करते हैं और अंतत: विदेशी दवा कंपनियों की शिकायत खारिज कर चीनी अदालत के न्यायाधीश लू योंग के पक्ष में निर्णय देते हैं- यह घटनाक्रम दर्शकों की आंखें नम कर देता है.

यह विडंबना है कि हम पाकिस्तान जैसे देश के नागरिकों की सहायता एवं वहां के संगठनों के साथ अमन की आशा जैसे पाखंड करना बहुत बड़ी उपलब्धि मानते हैं, परंतु चीन के साथ वहां के नागरिकों से संबंध बढ़ाना संदेह के घेरे में खारिज कर देते हैं. पिछले कुछ समय से नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व में युवाओं तथा सामान्य नागरिक स्तर पर मिलने-जुलने और विचार विनिमय का दौर बढ़ा है- जिसका सकारात्मक असर भी पड़ा है.

जिस समय शंघाई से मैं यह लेख लिख रहा हूं, बीजिंग में भारत से दो सौ युवाओं का प्रतिनिधिमंडल एक सप्ताह की यात्रा पर आया हुआ है. सिचुआन विवि के एक प्राध्यापक प्रो लू ने बताया कि कुनमिंग के पास एक योग विवि खुला है और पिछले वर्ष कोयंबटूर (भारत) में ईशा योग केंद्र में शिव-आराधना के निमित्त पांच सौ चीनी युवक-युवतियां आये थे. परंतु प्राय: ऐसी सकारात्मक घटनाओं की भारत के मीडिया में भी अनदेखी हो जाती है.

चीन में बीस हजार से अधिक भारतीय छात्र हैं, जो विभिन्न मेडिकल, इंजीनियरिंग कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे हैं. पंद्रह से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग है. बिहार से बड़ी संख्या में छात्र मेडिकल तथा इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए आते हैं, क्योंकि भारत में इन विषयों की पढ़ाई बहुत महंगी है तथा कॉलेजों में एक से दो करोड़ ‘डोनेशन’ का ‘पढ़ाई-टैक्स’ अलग से देना पड़ जाता है. चीन में रहना, खाना, फीस, सब मिलाकर बीस लाख रुपये के आस-पास डॉक्टरी, इंजीनियरिंग की डिग्री मिल जाती है.

यह स्थिति भारत में कैसे सुधरे इसकी हमें चिंता करनी होगी. चीन में भारतीयों को प्राय: सभी क्षेत्रों में भला, ईमानदार तथा भरोसे योग्य ‘अति बुद्धिमान’ मानते हैं. उदाहरण के लिए शंघाई जैसे औद्योगिक नगर में, जिसे चीन का न्यूयॉर्क कहा जाता है, भारतीय एसोसिएशन के समाजसेवी कार्यों की खूब चर्चा है. इसमें महेंद्रा टेक, टीसीएस, टाटा, एचसीएल जैसी कंपनियों और सीआईआई, फिक्की जैसे भारतीय उद्योग संगठनों के वरिष्ठ अधिकारी सदस्य हैं, तो अनेक विदेशी कंपनियों में शिखर स्थानों पर बैठे भारतीय भी हैं.

भारत का वाणिज्य दूतावास यहां सर्वाधिक सक्रिय विदेशी राजनयिक केंद्र है. और सिचुआन में कुछ दिन पहले ही ‘इंडिया कॉर्नर’ की स्थापना हुई है, जो इस बड़े व महत्वपूर्ण प्रदेश में भारतीय कला-संस्कृति, शिक्षा संबंधी गतिविधियां आयोजित करेगा.

शंघाई में भारतीय एसोसिएशन के सदस्यों ने चीन के अस्पतालों को एक हजार यूनिट रक्त दान किया है, जो चीन के सामाजिक इतिहास में अभूतपूर्व है. चीन में रक्तदान जैसी कोई कल्पना या व्यवस्था नहीं है. जब रक्त चाहिए, तो उसे खरीदा जाता है. भारतीयों द्वारा चीन के रोगियों को एक हजार यूनिट रक्तदान उन्हें अभिभूत कर गया.

हाल ही में हुए वुहान में मोदी-शी अनौपचारिक शिखर वार्ता के बाद बदले माहौल में अनेक सकारात्मक कदम उठाये जा रहे हैं. भारत में इसकी अच्छी प्रतिध्वनि होनी चाहिए. सब कुछ खराब और विवादग्रस्त ही नहीं है.

बहुत कुछ अच्छा और आशाजनक भी है. चीन केवल सेना, सरहद और संकट की आहट नहीं है. चीन केवल धमकियां और शत्रुता नहीं है. चीन चार हजार किलोमीटर लंबी सीमा से बंधा भारत का पड़ोसी होने के साथ पांच हजार वर्ष पुरानी सभ्यता वाली संस्कृति, सभ्यता, लोग और उनके रहन-सहन, भाषा, साहित्य, असंतोष और दमन-घुटन का स्वर भी है.

चीन को जाने-समझे बिना उसके साथ व्यवहार भी हम ठीक से तय नहीं कर पायेंगे. इसलिए बहुत जरूरी है कि अमेरिका, इंग्लैंड के दिवास्वप्न छोड़कर भारत के युवा अधिक-से-अधिक चीन जाएं, वहां के हालात को समझें और जन-स्तर पर संबंध बढ़ाएं. चीन की सरकार और कम्युनिस्ट पार्टी से वहां की जनता के स्वरों को थोड़ा-सा अलग करके देखने से स्थिति बेहतर समझ आयेगी.

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