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शिक्षा में निवेश

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आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमिटी ने शिक्षा के क्षेत्र में बुनियादी ढांचे और शोध में एक लाख करोड़ रुपये के व्यापक निवेश योजना को मंजूरी दी है.

मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा संचालित उच्च शिक्षा वित्त एजेंसी यह धन शैक्षणिक बॉन्ड, वाणिज्यिक उधार और कॉरपोरेट घरानों के जरिये जुटायेगी. सितंबर, 2016 में बनी इस एजेंसी की आधारभूत पूंजी को भी बढ़ाकर 10 हजार करोड़ रुपये कर दिया गया है. इस प्रयास से सरकार के पास सीमित पूंजी होने के कारण बजट आवंटन के दबाव को कम करने में बहुत मदद मिलने की उम्मीद है.

भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जो अपने कुल घरेलू उत्पादन का बहुत कम हिस्सा शिक्षा में खर्च करते हैं, जिसकी वजह से अधिकतर संस्थानों की हालत चिंताजनक है. साल 2017-18 की आर्थिक समीक्षा के अनुसार, 2012-13 में जीडीपी का 3.1 फीसदी, 2014-15 में 2.8 फीसदी और 2015-16 में 2.4 फीसदी हिस्सा इस क्षेत्र में खर्च हुआ था. साल 2016-17 में मामूली बढ़त के साथ खर्च 2.6 फीसदी तक पहुंचा था.

यह आंकड़ा छह फीसदी खर्च करने के सरकारी लक्ष्य से बहुत कम है. इस दस्तावेज में सामाजिक मदों में निराशाजनक निवेश को स्वीकार करते हुए कहा गया था कि विकासशील अर्थव्यवस्था होने के नाते शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में खर्च बढ़ाने की वित्तीय गुंजाइश बेहद कम है. बीते दो दशकों से शोध एवं विकास में निवेश कुंद पड़ा हुआ है, जो कि जीडीपी का महज 0.6 और 0.7 के स्तर पर है. ऐसे में कैबिनेट के ताजा फैसले के तहत पूंजी जुटाने की रणनीति कारगर हो सकती है. केंद्रीय और नवोदय विद्यालयों, तकनीकी और पेशेवर संस्थानों के साथ 47 केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए समुचित धन का इंतजाम अब मुश्किल नहीं होना चाहिए.

लेकिन, उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों की आधे से अधिक संख्या राज्यों के विश्वविद्यालयों में पढ़ती है. उनके वित्तपोषण तथा गुणवत्ता सुधार के लिए स्पष्ट नीतिगत पहल होनी चाहिए. कैबिनेट के फैसले के अनुसार, संस्थान धन बतौर कर्ज हासिल करेंगे. अभी तक अनुदान के रूप में राशि आवंटित होती थी.

इससे पारदर्शिता और उत्तरदायित्व निर्धारित करने में मदद मिलेगी. दस साल से ज्यादा पुराने तकनीकी और पेशेवर संस्थानों को अपनी आंतरिक कमाई से पूरे कर्ज की भरपाई करनी होगी, जबकि 2014 से पहले बने संस्थान इसका कुछ हिस्सा चुकायेंगे और बाकी सरकार देगी. केंद्रीय और नवोदय विद्यालयों तथा 2014 के बाद बने मेडिकल कॉलेजों और केंद्रीय विश्वविद्यालयों के सभी कर्ज सरकार की जिम्मेदारी होंगे.

इससे एक आशंका यह भी पैदा होती है कि कर्ज चुकाने के लिए छात्रों की फीस न बढ़ानी पड़े तथा कुछ जरूरी मदों में खर्च से संस्थानों को हाथ न खींचना पड़ जाये. इस संबंध में सरकार और संस्थानों को चौकस रहना होगा, ताकि गरीब और निम्न-आयवर्गीय छात्रों पर बेजा बोझ न बढ़े.

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