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पड़ोसी देश और कूटनीति

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बड़ी शक्तियों के संबंध मात्र द्विपक्षीय कारकों से निर्धारित नही होते हैं. उनके परस्पर संबंधों को क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय हलचलें भी प्रभावित करती हैं. यदि कोई दो बड़े देश पड़ोसी भी हों, तो कूटनीति के कई पेच सामने आते रहते हैं.
वैश्विक आर्थिक विकास और राजनीतिक महत्व की दृष्टि से बेहद अहम भारत और चीन के आपसी रिश्ते इन्हीं जटिल परतों से दो-चार रहते हैं. चीन में भारतीय राजदूत गौतम बंबावाले ने ताजा साक्षात्कार में दोनों देशों के साझे हितों और विरोधाभासों को रेखांकित किया है. हांगकांग के अखबार ‘साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट’ के साथ बातचीत में उन्होंने कहा है कि ड्रैगन (चीन का प्रतीक) और हाथी (भारत का सूचक) एक साथ नृत्य कर सकते हैं, पर भारत को बेल्ट एवं रोड पहल को लेकर ठोस आपत्ति है.
चीन की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत पाकिस्तानी साझेदारी में कश्मीर के अवैध कब्जेवाले इलाके में भी निर्माण कार्य की योजना है, जो कि भारतीय संप्रभुता को सीधी चुनौती है. इसी तरह से चीन डोकलाम में भी पैर पसारने की फिराक में है. यह स्वागतयोग्य है कि भारतीय राजदूत ने जहां दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों के बेहतर होते जाने का हवाला दिया है, वहीं विवादित मुद्दों पर भी दो टूक राय जाहिर की है. जब जून में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलेंगे, तो इन मसलों पर स्पष्टता के साथ बातचीत होने की आशा है.
लेकिन, भारत के अन्य पड़ोसी देशों के साथ गहराते चीनी रिश्ते को चिंता की बात मानने की बंबावाले की राय को सीधे स्वीकार कर पाना आसान नहीं है. उनका तर्क है कि दक्षिण एशिया के देशों के साथ भारत के बहुत पुराने और मजबूत संबंध हैं. यह बात ऐतिहासिक तौर पर तो दुरुस्त है, किंतु अंतरराष्ट्रीय राजनीति की उथल-पुथल और आक्रामक चीनी विस्तारवाद के वातावरण में पहले के रिश्तों में तेज बदलाव घटित हो रहे हैं.
म्यांमार, नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव और श्रीलंका में न सिर्फ चीन का निवेश बढ़ता जा रहा है, बल्कि इन देशों के आंतरिक राजनीतिक समीकरणों में भी उसका प्रभाव बढ़ रहा है. पड़ोसी देशों के हालिया प्रकरणों को देखते हुए भारत कूटनीतिक तौर पर निश्चिंत रहने का जोखिम नहीं उठा सकता है.
ऐसे में यह भी स्वीकार करना होगा कि पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को सकारात्मक बनाने के लिए सुविचारित नीतियों और प्रयासों की कमी रही है. चीन और पाकिस्तान के साथ बेहतरी की राह में तो सामरिक और रणनीतिक रोड़े हैं, परंतु अन्य देशों के साथ भरोसे की बनी-बनायी जमीन पर रिश्तों की नयी बुनियाद खड़ी करने की जरूरत है.
इस सिलसिले में यह भी सोचा जाना चाहिए कि हमारे पड़ोसी देश किन कारणों से चीन के नजदीक होने लगे हैं. जैसा कि राजदूत ने रेखांकित किया है और सरकार भी कहती रही है, चीन के साथ संबंध अच्छे करने की संभावनाएं हैं और बढ़ते वाणिज्य-व्यापार के साथ राजनीतिक संबंध भी सुधारे जा सकते हैं.
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