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उद्यमशीलता की कमी

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मौजूदा भारत में रोजगार की धारणा बदली है. हालिया दिनों में विचार-विमर्श के दौरान अक्सर कहा और सुना जा रहा है कि नौकरी करनेवाला नहीं, बल्कि नौकरी देनेवाला बनिए. तेज बढ़वार के सहारे वैश्वीकरण की धारा में अहम होती भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ऐसा आश्चर्यजनक भी नहीं है.
हमारे देश में विनिर्माण क्षेत्र अपेक्षाकृत स्थायी तथा सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से आकर्षक रोजगार का परंपरागत क्षेत्र रहा है, लेकिन इस क्षेत्र का प्रसार कई कारणों से अपेक्षानुरूप नहीं रहा और वैश्वीकरण के दौर में भारत की धाक सेवा क्षेत्र के जरिये जमी.
इसे स्थायित्व और विस्तार देने के लिए स्वरोजगार या निजी कारोबार अनिवार्य है. परंतु चिंता की बात है कि कारोबार शुरू करने के मामले में भारत की वयस्क आबादी दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत पीछे है. जीइएम इंडिया के ताजा रिपोर्ट के तथ्य बताते हैं कि भारत में 2016-17 में केवल पांच फीसदी वयस्क लोग ही अपना कारोबार कायम करने में सफल हो पाये और मात्र 11 फीसदी लोग उद्यमिता की शुरुआती गतिविधियों में लगे हैं.
ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन तथा दक्षिण अफ्रीका) देशों के लिहाज से भारत में कारोबार खड़े करने तथा उसके स्वामित्व वाले लोगों की संख्या कम है. ब्रिक्स देशों को तेज बढ़ोतरी की अर्थव्यवस्थाओं में शुमार किया जाता है. इनमें ब्राजील कारोबारी स्वामित्व की दर (17 फीसदी) के लिहाज से सबसे आगे और दक्षिण अफ्रीका सबसे पीछे (तीन फीसदी) है, जबकि भारत और रूस में ऐसी आबादी की तादाद पांच फीसदी है तथा चीन में यह आंकड़ा आठ फीसदी है.
ध्यान रहे, भारत से पांच गुना बड़ी अर्थव्यवस्था चीन में विनिर्माण क्षेत्र अपने विस्तार के लिहाज से विकसित मुल्कों के स्तर तक तकरीबन पहुंच चुका है. चिंता की एक बात यह भी है कि कारोबार शुरू कर कुछ समय बाद उसे अलाभकर पाकर छोड़ देने के रुझान भी भारत में अन्य विकासशील देशों के मुकाबले ज्यादा प्रबल हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, 18 से 64 साल के 100 लोगों में कम-से-कम 26 लोग कारोबार को शुरुआती दौर में ही अलग-अलग कारणों से बंद करने को विवश होते हैं.
ऐसे कारणों में लाल फीताशाही का भी नाम लिया सकता है और धन की कमी तथा पारिवारिक सहयोग के अभाव को भी, लेकिन एक बड़ा कारण (100 में 17 मामलों में) कारोबार का कालक्रम में अलाभकर साबित होना है. कुछ समय पहले एक अन्य अध्ययन में बताया गया था कि धन की कमी के अलावा कारोबार के लिए जरूरी नये विचार, कौशल तथा व्यावसायिक नैतिक आचार का अभाव 90 फीसदी मामलों में स्टार्टअप्स के बंद होने के लिए जिम्मेदार है.
नये कारोबार की शुरुआत एक विशेष कार्य-संस्कृति की मांग करती है. एक बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में हमारी लिए ऐसी उत्पादक कार्य-संस्कृति बड़ी जरूरत है. उम्मीद है कि इन अध्ययनों के आलोक में सरकार व्यवस्थागत दोषों के निवारण के लिए प्रयासरत होगी.
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