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पकौड़ा कथा चालू आहे!

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संतोश उत्सुक

व्यंग्यकार

होली के जाने के बाद भी स्वादिष्ट चीजें हमेशा हमारे मानसपटल पर अंकित रहती हैं. होली के हुड़दंग में दोस्तों के घरों में तरह-तरह के पकौड़े पेट में जाते रहे और चर्चा में भी गरम रहे. अच्छा पुनर्वालोकन हो गया कि शहर में कौन किस-किस चीज के स्वादिष्ट पकौड़े बनाकर बेचता है.

एक जगह तो पकौड़ों के लिए टोकन लेकर लाईन में लगना पड़ता है. कई लोगों ने पकौड़े अच्छी तरह से तलकर रोटी-कपड़ा-मकान के क्षेत्र में स्वादिष्ट सफलता को चखा है.

अनेक व्यावसायिक प्रशिक्षणों के दौरान पूछा जाता है कि यदि मछलियां पेड़ पर चढ़ जाएं, तो क्या होगा. इस प्रश्न के विविध व बड़े दिलचस्प जवाब आते हैं. जवाब देनेवाले सभी बेरोजगार नहीं होते. देश के बेहद महत्वपूर्ण व्यक्ति समझा रहे हैं कि बेरोजगार रहने से तो पकौड़े बेचना अच्छा है.

पिछले दिनों शिवरात्रि और होली के अवसर पर पकौड़े विशेषकर भांग के पकौड़े खूब बेचे खाये-पचाये गये हैं. कल्पना कीजिए, सभी बेरोजगार पकौड़े बेचें, तो क्या होगा. सबसे पहले तो अच्छे पकौड़े बनाना सीखने के लिए स्किल सेंटर खुलेंगे सिलाई सेंटरों की तर्ज पर. नेता का बच्चा पढ़ने में होशियार नहीं है, नेतागिरी भी नहीं चल रही, तो वह राष्ट्रीय स्तर का पकौड़ा पकाऊ-सिखाऊ सेंटर खोलकर व्यवसाय शुरू कर सकता है. नये खाद्य खोजे जा रहे हैं, जिन्हें पकौड़ा बना दिया जायेगा.

प्रसिद्ध शेफ नये रंग-स्वाद और आकार-प्रकार के पकौड़े मार्केट में लायेंगे, जो स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुंचायेंगे. उनसे मोटापा नहीं बढ़ेगा, पेट तो बिल्कुल नहीं.

हर गली में अनेक दुकानें होंगी, मगर बिना लाइसेंस के पकौड़े नहीं बिकेंगे. स्पर्धा का माहौल बना रहे व ज्यादा से ज्यादा लोग इस पवित्र काम से जुड़ें इसके लिए सरकारी लोक संपर्क विभाग के लोक कलाकार लोगों को सुबह से शाम तक पकौड़े खाने के लिए प्रेरित करेंगे.

स्वास्थ्य विभाग बिना फ्राई किये पकौड़े के लिए अनुसंधान करवायेगा. स्कूलों व कार्यालयों में आयोजित किये जा रहे समारोहों में ज्यादा मिर्च वाले या बहुत बड़े आकार के पकौड़े खाने की प्रतियोगिता होगी, जहां मुख्य अतिथि बनने के लिए होड़ लगेगी.

राजनीतिक समारोहों में पकौड़े मुख्य पकवान होंगे. पकौड़े बेचने की दुकान खोलने का फायदा यह होगा कि न बिके तो बंदा खाकर अपना, परिवार व पड़ोसियों का पेट भर सकेगा.

सरकार बेरोजगारों को ‘पकौड़ा बनाओ ऋण’ उपलब्ध करा सकती है, मगर सब्सिडी का सख्त अनुशासन के जमाने में कोई चांस नहीं, हां बैंक वालों को लंच में पकौड़े सप्लाई कर किस्त चुकायी जा सकेगी. कर्ज नहीं भी चुका, तो एनपीए माफ करने की हमारे यहां करोड़ी परंपरा है ही, लेकिन छोटे ऋण माफ नहीं किये जा सकेंगे. विदेशी जंक फूड कंपनियों की आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो जायेगी, क्योंकि भारतवासी अपने स्वदेशी पकौड़े खाने के राष्ट्रीय संकल्प में बंधे रहेंगे.

कुल मिलाकर, पकौड़े बनाना, बेचना और खाना फायदे का सौदा रहेगा. लेकिन, मेहनत तो करनी होगी.

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