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संबंधों की प्राथमिकता में हम

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II मुकुल श्रीवास्तव II
टिप्पणीकार
मौत एक सच है, पर जब आप रिश्तों की डोर से किसी अपने को खोते हैं, तब लगता है ऐसे जीवन का फायदा ही क्या? खासकर वे लोग, जिनके होने से हमारा घर कभी परिवार बन जाया करता था.
बचपन में मेरे लिए परिवार का मतलब मेरे माता-पिता, भाई और तीन चाचा था. इन सबसे बराबर का हिलना-मिलना, इनके साथ घूमना-फिरना, उनसे किस्से-कहानियां सुनना और न जाने क्या-क्या करना हमें अच्छा लगता था. जो काम माता-पिता नहीं कर रहे हों, वह काम चाचा जरूर कर देंगे.
मुझे याद है. घर में फ्रिज और टीवी के लिए पैसे भले ही पिता जी ने दिये हों, लेकिन वह चाचा ही थे, जिन्होंने हम लोगों की महीनों की पुरानी मांग पर ध्यान दिया था और पिता जी को इसके लिए राजी भी किया था. हॉस्टल से जब पहली बार हम घर लौट रहे थे, तब वह चाचा ही थे, जो हमें लेने आये थे और हम भी दौड़कर उनसे लिपट गये थे कि चाचा आ गये, अब हम अपने घर जायेंगे.
लगता ही नहीं था कि कभी इन रिश्तों के मायने भी बदलेंगे. फिर हम बड़े हुए. हमारे अपने परिवार बने. और जो लोग कभी हमारे परिवार का हिस्सा हुआ करते थे, वे पीछे छूटते चले गये, क्योंकि उनका अपना परिवार बन रहा था, बढ़ रहा था. हम भी बचपन को छोड़ जीवन में नये रिश्ते बना रहे थे. सब कुछ व्यवस्थित, किसी से न कोई गिला था, न शिकवा था. लेकिन, ऐसे लोग जब अचानक चले जायें, तो समझ नहीं आता कि आखिर यह सूनापन, यह उदासी क्यों? हम लोग तो कबके अपने-अपने परिवारों में रम चुके थे.
ऐसे रिश्ते के इस दुनिया से जाने के बाद जब आप श्मशान घाट पर खड़े-खड़े बीते सालों को अपनी आंखों के सामने जी रहे होते हैं, तब आंखें समंदर हो जाती हैं. खड़े-खड़े सोचते हैं- तब जिंदगी कितनी हसीन थी और वे सारे रिश्ते, जो अब इतिहास हो चलें हैं, कभी हमारे कितने अपने थे, प्रिय थे. अब हम किसी को क्या बतायें कि आंखें क्यों समंदर हुई जा रही हैं.
आज भागती-दौड़ती जिंदगी में जब लोगों के पास अपने माता-पिता तक के लिए फुर्सत नहीं है, वहां चाचा-बुआ के जाने का मातम मनाने की फुर्सत भला किसे है? जिन लोगों के रिश्तों से आप जुड़े थे, वे तो जा चुके हैं, फिर कभी न आने के लिए. और उन्होंने जो नये रिश्ते बनाये, वे यह बात कभी जानेंगे ही नहीं कि आपको कितना दर्द है? क्योंकि आप अब करीबी रिश्तों से दूर हो चले हैं, या यूं कहें कि संबंधों की सामाजिक प्राथमिकता में अब आप दूर के पायदान पर हैं.
जब आप उन रिश्तों के साथ थे, तब कोई और नहीं था. इसे जिंदगी का विस्तार कहें या रिश्तों का सिमट जाना. शायद यही है चालीस पार का हमारा जीवन, जहां जिंदगी तो विस्तार पा रही है, पर वे रिश्ते जो हमारे बचपन की सुहानी यादों का हिस्सा थे, वे खुद ही कहानी बनते जा रहे हैं. मैं सिमट रहा हूं या विस्तार पा रहा हूं! यह सोचना जारी है…
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