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Home Opinion हाफिज सईद की रिहाई का मकसद

हाफिज सईद की रिहाई का मकसद

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पुष्परंजन, ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक

इंसानियत का दुश्मन, पाकिस्तान के लिए हीरो है. 26/11 की बरसी के दो दिन पहले आतंकी सरगना हाफिज सईद को रिहा करने का मकसद हमारे जले पर नमक छिड़कना रहा है. जिसके सिर पर अमेरिका ने 2012 में एक करोड़ डाॅलर का इनाम घोषित कर रखा हो, ऐसा आतंकी पांच साल से छुट्टा घूम रहा है. अमेरिका को यह कहने की जरूरत क्या है, कि दोबारा से नजरबंद कर दो. यह कोई मैच फिक्सिंग तो नहीं है? मुंबई हमले का मास्टर माइंड, जिसकी वजह से 2008 में 160 से अधिक लोग मारे गये, ऐसे आतंकी की गिरफ्तारी का ड्रामा सातवीं बार हो चुका है. इसी लाहौर हाईकोर्ट ने हाफिज सईद को छठी बार रिहा करने का आदेश दिया. ऐसा लगता है, जैसे अदालत नहीं, खाला का घर हो, जब मर्जी रिहाई का फरमान जारी करा लीजिये!

कश्मीर के नाम पर आतंक की दुकान

हाफिज सईद को जब जनवरी, 2017 के आखिर में नजरबंद किया गया था, उस समय पाकिस्तान के प्रतिरक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ की टिप्पणी थी, ‘यह शख्स समाज के लिए खतरनाक है.’ उस समय उसके साथ चार और लोग अब्दुल्ला उबैद, जफर इकबाल, अब्दुर्रहमान आबिद और काजी कासिफ नियाज नजरबंद किये गये थे. हाफिज सईद की आतंक की दुकान कश्मीर की वजह से चल रही है. यही उसकी यूएसपी है. गुरुवार को नजरबंदी से छूटते ही लाहौर की सभा में उसने ऐलान किया, ‘इंशाअल्लाह हम कश्मीर की आजादी की कोशिश जारी रखेंगे, और इसके लिए पाकिस्तान की अवाम को एकजुट करेंगे.’ हाफिज सईद की एक संस्था ‘तहरीक ए आजादी कश्मीर’ की टेरर फंडिंग का सबूत पेरिस स्थित फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) में भारत ने दिया, तो जून 2017 में पाकिस्तान के पास उसे प्रतिबंधित करने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचा था. वर्ष 2002 में लश्करे-तैयबा ‘बैन’ किया गया था. संयुक्त राष्ट्र के दबाव के बाद 2008 में इसके बैंक खातों को जब्त किया गया, और हाफिज सईद की विदेश यात्राओं पर रोक लगायी गयी.

पाक राजनीति से हाफिज की जुगलबंदी

सरगोधा, पाकिस्तान में 1950 में जन्मा हाफिज सईद अब उम्र के उस पड़ाव पर है, जब इंसान थकने लगता है. सुना है कि ऐसे थकेले का इस्तेमाल पाकिस्तान के नेता आम चुनाव में भी करेंगे. मगर, सैन्य प्रशासन इससे क्या चाहता है? 1980 के दशक में हाफिज सईद सऊदी अरब इस्लामिक शिक्षा के वास्ते गया था, जहां उसकी मुलाकात फिलस्तीनी स्काॅलर अब्दुल्ला उज्जम से हुई. 1980 के उत्तरार्द्ध का वह दौर था, जब अफगानिस्तान में सोवियत ताकतों को शिकस्त देने के वास्ते कश्मीरी लड़ाके भी जुटने लगे थे. हाफिज सईद को इस तरह की आग को सुलगाने में अपना मुस्तकबिल दिख रहा था. उसे लगा कश्मीर एक हाॅट केक है, जिसे भविष्य में दुनियाभर से फंड और समर्थन हासिल होता रहेगा. वर्ष 1987 में हाफिज सईद ने ‘जमातुल दावा’ और उसके प्रकारांतर लश्करे-तैयबा की बुनियाद रख दी. फंड की कोई कमी नहीं हुई, क्योंकि पीठ पीछे सऊदी अरब था. हाफिज सईद के नियंत्रण में ‘मरकज दावा वल इरशाद’ नामक एक और संस्था बनी है. उसकी रणनीति यह होती है कि एक संगठन बंद हुआ, तो उससे पहले दूसरा आतंकी संगठन खड़ा कर दो, ताकि फंड की दिक्कत दरपेश न हो.

बेटे को बना रहा अपना अक्स

हाफिज सईद, अपने इकलौते बेटे तलहा सईद को ‘चीफ ग्लोबल पब्लिशिस्ट’ बनाकर अपना अक्स तैयार कर रहा है. पंजाब के उधमपुर और गुरदासपुर में जो हमले हुए थे, सुरक्षा एजेंसियों को शक था कि उन आतंकी कार्रवाइयों को तलहा सईद की देखरेख में अंजाम दिया गया था. जनवरी, 2017 की नजरबंदी के दौरान तलहा सईद ही आतंकवाद की सुपारी लेता रहा है. मगर, तलहा सईद का तालमेल दूसरे संगठनों से प्रभावी नहीं हो पा रहा है, यह हाफिज सईद के इर्द-गिर्द के लोग स्वीकार करते हैं. अमेरिकी विदेशमंत्री रैक्स टिलरसन 24 अक्तूबर, 2017 को इस्लामाबाद गये थे. उस यात्रा के दौरान टिलरसन ने 20 आतंकी समूहों की सूची पाकिस्तान को दी थी, और यह पूछा था कि इनके सफाये के वास्ते उसके पास क्या योजना है? पाकिस्तान ने बस इतना कहा कि उसे कोई ‘स्पेसिफिक जानकारी’ मिलती है, तो कार्रवाई में सहयोग करेगा. अमेरिकी विदेशमंत्री रैक्स टिलरसन ने अपनी दो चिंताएं स्पष्ट कर दी थीं. उन्होंने कहा कि फाटा (फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरिया) पर जिस तरह से हक्कानी नेटवर्क, जुंदल्ला, तहरीके तालिबान पाकिस्तान सक्रिय हैं, उससे लगता है कि इस पूरे इलाके में उन्हें पाक सेना सरपरस्ती दे रही है. टिलरसन ने पाक-अफगान सीमा पर हरकतुल जिहादी ए इस्लामी, जमातुल अहरार, जमातुद दावा अल कुरान, तारिक गिदार ग्रुप जैसे तेरह आतंकी गुटों का नाम लिया, जिनका तहरीके तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से संबंध है. दूसरा, टिलरसन ने कश्मीर सीमा पर सक्रिय जैश ए मोहम्मद, हरकतुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा को विशेष तौर पर उल्लेख किया, जिनकी गतिविधियां रोकने में पाक सरकार नाकाम रही है.

‘कूटनीतिक कवर’ में दहशतगर्दी

यों, कहने के लिए पाकिस्तानी पंजाब के शेखूपुरा जिले के मुरीदके तहसील में लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय है, मगर हाफिज सईद का रिश्ता अफगानिस्तान से कम नहीं हुआ है. वर्ष 1987 में फिलस्तीनी स्काॅलर अब्दुल्ला उज्जम, जफर इकबाल की मदद से हाफिज सईद ने अफगानिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा की बुनियाद रखी थी. जनवरी, 2017 में हाफिज सईद जब नजरबंद हुआ, उस समय चेंग क्वोफिंग पाकिस्तान गये थे. चेंग क्वोफिंग चीन के उप विदेशमंत्री के साथ विदेश स्थित आतंकनिरोधी मामलों के वरिष्ठ अधिकारी हैं. बाहर यह बताया गया कि ग्वादर तक चीनी मार्ग की सुरक्षा के वास्ते उनका पाकिस्तान जाना हुआ था. मगर, उसमें हाफिज सईद की क्या भूमिका हो सकती थी? ऐसे सवालों का उत्तर देने से चीनी विदेश मंत्रालय कटता रहा. हाफिज सईद को ‘कूटनीतिक कवर’ देने में चीन की जिस तरह लगातार भूमिका रही है, उससे लगता है कि चीन, शिन्चियांग से लेकर, अफगानिस्तान और ग्वादर में हाफिज सईद जैसे दहशतगर्द नेताओं को नाराज नहीं करना चाहता. सवाल यह है कि पाक अदालत और ‘मिलिट्री एशटब्लिशमेंट’ को हाफिज सईद की रिहाई के लिए यही समय क्यों सूझा? क्या उसकी वजह कश्मीर में कमजोर पड़ती जा रही पाकिस्तान की पकड़ है, या फिर अफगानिस्तान में भारत के विरुद्ध, हाफिज सईद के आतंकियों के जरिये कोई बड़ी योजना बनायी जा रही है? दोनों में से कुछ भी संभव है!

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