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फिल्म पर बवाल

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रानी पद्मावती कोई ऐतिहासिक चरित्र है या एक कवि की कल्पना? कोई चरित्र ऐतिहासिक हो, तो उसके चित्रांकन में साहित्यकार या फिल्मकार का रचनात्मक छूट लेना उचित है या नहीं?

क्या ऐतिहासिक या काल्पनिक चरित्र के रूप में रानी पद्मावती का कोई एक ही आख्यान प्रामाणिक माना जाये? अगर ऐसे चरित्र के एक से अधिक आख्यान हों, तो साहित्यकार या फिल्मकार उनमें से किसे अपने रचना-कर्म का विषय बनाये और उसमें कहां तक परिवर्तन करे? ये सब प्रश्न कठिन हैं तथा आम जन की चिंता के वृत्त से किंचित बाहर भी, परंतु ये प्रश्न पद्मावती पर बनी फिल्म को लेकर बीते कई महीनों से उठ रहे हैं. फिल्म जब अपने निर्माण की प्रक्रिया में थी, तो एक समुदाय-विशेष के प्रतिनिधियों ने तोड़-फोड़ की थी.

उनका तर्क था कि पद्मावती के ऐतिहासिक चरित्र से फिल्मकार ने न्याय नहीं किया है और इससे उस समुदाय के मान-सम्मान को चोट पहुंचायी है. जनवरी से चला आ रहा विवाद नवंबर में और अधिक तूल पकड़ चुका है. एक प्रदेश के मुख्यमंत्री ने बोर्ड की अनुमति के बाद भी फिल्म के प्रदर्शन को रोकने की बात कर रहे हैं, तो एक अन्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का कहना है कि फिल्मकार को किसी समुदाय की भावनाओं को आहत करनेवाली फिल्म बनाने से बचना चाहिए. उल्लेखनीय है कि ये दोनों मुख्यमंत्री राजनीतिक रूप से परस्पर विरोधी शिविरों से हैं.

राजनीति की दुनिया से अलग, फिल्म उद्योग के एक भाग में मांग उठ रही है कि गोवा में होने जा रहे सरकारी फिल्म उत्सव का बहिष्कार किया जाये, क्योंकि सरकार इस फिल्म के मामले में कलाकारों को पर्याप्त सुरक्षा देने को तत्पर नहीं है, जबकि न्यायालय का मानना है कि फिल्म के बारे में संवैधानिक निकाय के तौर पर प्रमाणन बोर्ड को ही फैसला लेना चाहिए, क्योंकि यह उसी के अधिकार क्षेत्र में आता है.

मामले के भरपूर राजनीतीकरण के बीच फिल्म, फिल्मकार और अभिनेता-अभिनेत्री की सुरक्षा का मुद्दा एकदम ही पीछे चला गया है और राजनीतिक मंचों से खुलेआम हिंसक धमकियां दी जा रही हैं.

इतिहास हमेशा ही विवाद का विषय बनता है, क्योंकि राष्ट्र या फिर समुदाय की पहचान इतिहास से बनती है. साथ में याद रखने की बात यह भी है कि इतिहास एकदम सीधा-सपाट नहीं होता है, समय के अनुरूप समुदाय और राष्ट्र अपने इतिहास का पुनर्लेखन और पुनर्पाठ करते हैं. इसमें परंपरा से चली आ रही स्मृतियों, गाथाओं तथा मान्यताओं की महती भूमिका होती है. जायसी की रचना ‘पद्मावत’ लोभ-लालच के कारण होनेवाले युद्ध की व्यर्थता और मानुष-प्रेम के सर्वोपरि होने की कहानी है.

‘पद्मावती’ शीर्षक से बनी फिल्म के बारे में निर्णय लेने की प्रक्रिया में जायसी की रचना के मर्म को भी संज्ञान में लेना चाहिए. सभ्य लोकतांत्रिक समाज में हिंसा या दबाव से राह निकालने का प्रयास आत्मघाती है तथा विधि द्वारा स्थापित प्रणाली ही समाधान का माध्यम बन सकती है.

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