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संवाद की जरूरत

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रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
जीवंत, पारदर्शी और प्रभावशाली लोकतंत्र में संवाद, असहमति, वाद-विवाद, प्रतिरोध के लिए सदैव स्थान बना रहेगा. संवाद की जरूरत प्रत्येक व्यक्ति और समाज को है. अरुंधती राय ने अपनी पुस्तक ‘लिसनिंग द ग्रासहाॅपर्स : फील्ड नोट्स ऑन डेमोक्रेसी’ (2009) की भूमिका में यह सवाल किया है कि ‘क्या लोकतंत्र के बाद जीवन है.’
इसी तर्ज पर यह सवाल किया जा सकता है कि क्या संवाद के बिना कोई जीवन, समाज और विचारधारा है? असहमति का भी सौंदर्य है. भारतीय इतिहास में व्यक्तियों ने ही नहीं, संगठन और समूह ने भी समय-समय पर सत्ता, शासन-प्रशासन और भिन्न मतावलंबियों से प्रश्न किये हैं. असहमित, मतभेद, वैचारिक भिन्नता, संदेह, तर्क, वाद-विवाद, बहस आदि की हमारे यहां एक सुदीर्घ परंपरा है, जिसने जाति-व्यवस्था, वर्ण-व्यवस्था, पितृ सत्ता आदि पर प्रश्न खड़े किये.
पहले स्कूलों, कॉलेजों (विश्वविद्यालयों में भी) में डिबेटिंग सोसाइटी होती थी और अब समाप्त होती जा रही है. संवादरत होना सामाजिक, तार्किक, चिंतनशील और विचारवान होना है. आज हमें व्यक्ति और समाज, समाज और राज्य, राज्य और कॉरपोरेट, कॉरपोरेट और वित्तीय पूंजी के आपसी संबंधों एवं संवादों को देखने-समझने की जरूरत है. संभव हो तो उनमें अपनी भागीदारी करने की भी.
मानव संस्कृति एवं समाज के प्रत्येक क्षेत्र में ‘कम्युनिकेशन’ एक मौलिक मुद्दा है. कहना और बोलना जितना आवश्यक है, उतना ही सुनना भी. लोकतांत्रिक एवं धर्म-निरपेक्ष राजनीति की सफलता के लिए बौद्धिक बहुलतावाद एवं सार्वजनिक वाद-विवाद आवश्यक है.
जहां तक सत्य कथन और संवादरत होने का प्रश्न है, उसका कोई एक रूप ग्राह्य-मान्य नहीं हो सकता. स्पष्ट कथन के अतिरिक्त भी कई ऐसे कथन होते हैं, जिनके संकेतों, आशयों, निहितार्थों, गूढ़ार्थों को पकड़ने की आवश्यकता होती है. दो तरफा संचार या संवाद का महत्व सदैव बना रहेगा. राजनीति में ही नहीं कला, साहित्य और संस्कृति में भी यह संचार-संवाद आवश्यक है.
स्वीकारने और खारिज करने की दृष्टि संवादप्रिय नहीं हो सकती. स्वगत-भाषण जहां अधिकार और प्रभुत्व से जुड़ा होता है, वहां संवाद सहयोग से समयानुसार, स्थानानुसार, संवाद के रूप भी बदलते हैं. जिस समय भाषा की चोरी हो रही हो, उस समय कवियों-लेखकों की यह जिम्मेदारी होती है कि वे शब्दों की भी, भाषा की भी रक्षा करें. शब्दों पर आक्रमण हमारी स्मृतियों, संस्कृतियों और विचार दृष्टियों पर भी आक्रमण है.
इससे बेखबर कवि, लेखक, कथाकार अपनी ऊर्जा व्यक्ति-विशेष पर आक्रमण कर नष्ट करते हैं. हमारे समय के अनेक कवियों, लेखकों की चिंता में पूंजीवाद का यह वर्तमान रूप नहीं है, जो विचार और विचारधारा को ही नहीं, लोकतंत्र को भी कमजोर कर रहा है. क्या लोकतंत्रविहीन पूंजीवाद के दौर में हम प्रवेश नहीं कर रहे हैं?
स्लावोज जिजेक ने लोकतंत्र द्वारा बीसवीं शताब्दी के आकार ग्रहण करने की बात कही है. पिछली सदी में लोकतंत्र की भूमिका थी, पर वर्तमान सदी में वे ‘सत्तावादी पूंजीवाद’ (ऑथोरिटेरियन कैपिटलिज्म) को प्रमुख मानते हैं. यह सत्तावादी पूंजीवाद ही इक्कीसवीं सदी का अधिक निर्माण कर रही है. अब लोकतंत्र चुनाव में सिकुड़ रहा है. लोकतंत्र केवल चुनावी लोकतंत्र नहीं है.
जिजेक ने सही मायने में एक क्रियाशील, क्रियात्मक लोकतंत्र के लिए किसी सक्षम, शक्तिशाली, समर्थ नेता की जरूरत न मानकर एक प्रभावशाली समर्थ, सक्षम जनता को आवश्यक माना है, जो अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों को बिना प्रमाण सही नहीं मानती. लोकतंत्र में सत्तावादी, अधिकारवादी नेतृत्व का शोर लोकतंत्र के लिए स्वास्थ्यकर नहीं है, क्योंकि वहां संवाद के लिए भी कोई स्थान नहीं होता. सिंगापुर और चीन को जिजेक ने ‘अधिकारवादी पूंजीवाद’ का सुप्रसिद्ध उदाहरण माना है और इसके बाद वे भारत को रखते हैं. बिना सहमति के भूमि-अधिग्रहण को, ‘लाेकतंत्रविहीन पूंजीवाद’ से जोड़ा गया है.
जिजेक ने साफ शब्दों में कहा है कि भारत को चीन का मुकाबला करने या उससे आगे बढ़ने के लिए अधिकारवादी पूंजीवाद को स्वीकारना होगा.
‘अधिकारवादी पूंजीवाद’ पर अधिक चर्चा नहीं होती. प्रगतिशील कवि, लेखक, बुद्धिजीवी के समक्ष आज के समय में संवादरत होना जरूरी है. यह समाज और लोकतंत्र के लिए आवश्यक है. जब शब्द का वास्तविक अर्थ तिरोहित हो रहा हो, भाषा की अपनी शक्ति खतरे में हो, विसंवादी स्वरों का बाहुल्य हो, तब प्रत्येक सचेत नागरिक का संवादरत होना आवश्यक है. क्या हम यह मान लें कि हमारा सारा संवाद अपनों के बीच होता रहेगा?
क्या विरोधी विचारवाले व्यक्तियों, समूहों, संगठनों, दलों से अब संवाद की जरूरत सचमुच नहीं रही? समाचार पत्र-पत्रिकाएं, विचार-चर्चायें, गोष्ठियां-संगोष्ठियां सर्वत्र संवाद का कोई एक रूप नहीं होता. साक्ष्यों, तर्कों, प्रमाणों सहित बहसों के लिए अब कम जगह बच रही है. पूंजीवाद के इस नये रूप से पुरानी चीजें, पुराने रूपों में कम बचेंगी. वैचारिक भिन्नता एक स्वस्थ ‘फेनामेनन’ है. यह समय ‘छवि निर्मिति’ और ‘छवि ध्वंस’ का है.
आवश्यक है, इसे रचनात्मक, विवेकवान और चिंतनशील बनाना. यह पारस्परिक संवाद के बिना संभव नहीं है, इसलिए आज संवाद की अधिक जरूरत है.
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