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Home Opinion कम उम्र में ही निर्मल महतो वह कर गये जो पूरी जिंदगी में भी लोग नहीं कर पाते

कम उम्र में ही निर्मल महतो वह कर गये जो पूरी जिंदगी में भी लोग नहीं कर पाते

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कम उम्र में ही निर्मल महतो वह कर गये जो पूरी जिंदगी में भी लोग नहीं कर पाते

अनुजसिन्हा

निर्मल महताे. झारखंड आंदाेलन आैर झारखंड का बड़ा नाम. शहादत देकर झारखंड आंदाेलन की गति काे तेज किया.लाेग मानते हैं कि अगर निर्मल महताे नहीं हाेते, ताे झारखंड राज्य बनने में कुछ आैर वक्त लगता. 8 अगस्त 1987 काे जमशेदपुर में जिस समय निर्मल महताे की हत्या हुई, उस समय वे झारखंड मुक्ति माेरचा के केंद्रीय अध्यक्ष थे. उम्र थी सिर्फ 37 साल. लेकिन इतनी कम उम्र में भी उन्हाेंने झारखंड बनने का रास्ता तैयार कर दिया था आैर इतना कुछ कर दिया कि आज भी झारखंड उन्हें हर पल याद करता है, उनकी कमी काे महसूस करता है.

वे एक संगठनकर्ता थे. विनाेद बिहारी महताे के झामुमाे से अलग हाेने के बाद शिबू साेेरेन ने उन्हें अध्यक्ष बनाया था. शिबू साेरेन, निर्मल महताे की ताकत काे समझते थे. सामाजिक समीकरण काे शिबू साेरेन समझते थे. अध्यक्ष बनने के बाद निर्मल महताे का पूरा ध्यान संगठन काे मजबूत करने आैर उसे आक्रामक बनाने में लगा था. वे जानते थे कि झारखंड आंदाेलन काे तेज करने में कई प्रिय आैर अप्रिय फैसले लेने हाेंगे, कड़े फैसले लेने हाेंगे.

यह सब झारखंड मुक्ति माेरचा अकेले नहीं ले सकता है. इसलिए उन्हाेंने झामुमाे का छात्र संगठन बनाने का सुझाव शिबू साेरेन काे दिया था. शिबू साेरेन मान गये थे. आजसू का गठन उन्हीं का प्रयास था. आजसू काे बनाने के पीछे निर्मल महताे की कुछ याेजना थी. यही कारण था कि निर्मल महताे की हत्या के बाद आजसू की आेर से तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. हिंसा हुई थी. सूरज सिंह बेसरा आैर प्रभाकर तिर्की पर उन्हें पूरा भराेसा था आैर इन दाेनाें के भराेसे उन्हाेंने आजसू काे छाेड़ा था.आजसू के नेता-कार्यकर्ता कैसे प्रशिक्षण पायेंगे, इसकी भी नीति उन्हाेंने ही बनायी थी.उन्हाेंने ही आजसू के नेताआें काे असम आैर गाेरखालैंड आंदाेलन के नेताआें से मिलने के लिए भेजा था. वे जानते थे कि अलग झारखंड राज्य के लिए जैसी लड़ाई चाहिए, उसके लिए खास प्रशिक्षण चाहिए. ऐसे रणनीतिकार थे निर्मल महताे.

जिस आजसू काे निर्मल महताे ने बनाया था, उसने झारखंड आंदाेलन में कितनी बड़ी भूमिका अदा की, यह देश देख चुका है. हिंसात्मक आंदाेलन, लगातार आर्थिक नाकेबंदी, बंद, रेलवे ट्रैक काे उड़ाने की घटना ने केंद्र काे बात करने के लिए बाध्य किया था. उसके बाद ही ताे राज्य बनने का रास्ता खुला. बातचीत का दाैर आरंभ हुआ. यह अगल बात है कि बाद में आजसू आैर झामुुमाे में दूरी बढ़ती चली गयी. ऐसी बात नहीं कि झामुमाे से जुड़ने के बाद नेता बने थे निर्मल महताे. नेतृत्व गुण ताे उनमें कॉलेज के दिनाें से था. जमशेदपुर में रहते हुए जब वहां सूदखाेराें ने आतंक मचाया था, ताे ऐसे सूदखाेराें काे खाेज-खाेज कर उनकी टीम पिटाई करती थी.

उनकी टीम में निर्मल भट्टाचार्य, अखिलेश्वर जैसे उनके साथी थे. गुवा गाेलीकांड के बाद जब शैलेंद्र महताे के प्रयास से निर्मल महताे झामुमाे में आये ताे दाेनाें की ताकत बढ़ी आैर इसका असर आंदाेलन पर पड़ा. आंदाेलन तेज हुआ, संगठन धारदार बना. अनेेक गुणाें से भरपूर थे निर्मल महताे. दिलेर, अच्छा दाेस्त,जाे बाेल दिया साे किया. तिरूलडीह फायरिंग के बाद जब अजय महताे आैर धनंजय महताे के शव काे लेकर काेई उनके गांव जाना नहीं चाह रहा था, निर्मल महताे ने यह जिम्मेवारी निभायी. तब पुलिस का आतंक बहुत ज्यादा था. जाेखिम था, फिर भी निर्मल महताे ने यह जाेखिम लिया. ऐसे निर्मल महताे की कमी काे आज झारखंड महसूस करता है.

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