रॉड से पिटाई, छोड़ते थे खूंखार कुत्ते, पेचकस-बल्लम से दागा शरीर… मुजफ्फरनगर फैक्ट्री के बंधुआ मजदूरों की खौफनाक कहानी; मिली आजादी

UP Muzaffarnagar Bonded Labour Rescue: मुजफ्फरनगर की एक फैक्ट्री से छुड़ाए गए बंधुआ मजदूरों ने पुलिस को अपनी आपबीती सुनाई. मजदूरों का आरोप है कि उन्हें महीनों तक कैद रखकर लोहे की रॉड और भाले जैसी नुकीली चीजों से पीटा गया. फैक्ट्री से भागने से रोकने के लिए पिटबुल कुत्तों का इस्तेमाल किया जाता था.

By Anant Narayan Shukla | June 26, 2026 9:57 AM

UP Muzaffarnagar Bonded Labour Rescue: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में बंधुआ मजदूरी का एक बेहद सनसनीखेज मामला सामने आया है. यहां डिस्पोजेबल कटोरी बनाने वाली एक फैक्ट्री से छुड़ाए गए 12 मजदूरों ने पुलिस और डॉक्टरों को बताया कि उन्हें महीनों तक फैक्ट्री के अंदर कैद रखकर अमानवीय यातनाएं दी गईं. उनका आरोप है कि विरोध करने पर लोहे की रॉड और भाले जैसी नुकीली चीजों से पीटा जाता था, जबकि फैक्ट्री से भागने की कोशिश रोकने के लिए पिटबुल कुत्तों को पहरे पर रखा गया था.

यह दोना पत्तल की फैक्ट्री मुजफ्फरनगर के मंडी गांव में तितावी थाना क्षेत्र के अंतर्गत स्थित है. इसे प्रदीप बालियान और उसके पुत्र अंकित बालियान ने पूर्व प्रधान विपिन कुमार के घर में लगाई थी. पुलिस ने छापेमारी कर वहां से 12/13 मजदूरों को मुक्त कराया. फिलहाल सभी मजदूरों का इलाज चल रहा है और उन्हें मनोवैज्ञानिक परामर्श भी दिया जा रहा है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, मामले का खुलासा तब हुआ जब राजस्थान के जोधपुर जिले का एक मजदूर किसी तरह फैक्ट्री की दीवार फांदकर भागने में सफल हो गया. वह सीधे पुलिस तक पहुंचा और पूरी घटना की जानकारी दी. इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए फैक्ट्री से अन्य मजदूरों को भी छुड़ाया.

नौकरी का वादा, फिर छीन लिए मोबाइल और पहचान पत्र

पुलिस जांच में मजदूरों ने बताया कि उन्हें रेलवे स्टेशन और सार्वजनिक स्थानों से अच्छी नौकरी, नियमित वेतन, रहने और खाने की सुविधा का लालच देकर मुजफ्फरनगर लाया गया था. फैक्ट्री पहुंचते ही उनके मोबाइल फोन छीन लिए गए. पहचान से जुड़े दस्तावेज नष्ट कर दिए गए और महीनों तक परिवार से संपर्क पूरी तरह खत्म कर दिया गया. इन श्रमिकों को डेढ़ साल से काम करने का कोई वेतन भी नहीं दिया गया था. 

रामू बोले- हम कैदियों की तरह रहते थे

उत्तराखंड के नैनीताल निवासी रामू ने बताया कि करीब ढाई महीने पहले उन्हें नौकरी का झांसा देकर यहां लाया गया था. उन्होंने कहा, ‘हमारे साथ कैदियों जैसा व्यवहार होता था. फैक्ट्री के गेट से बाहर निकलने तक की इजाजत नहीं थी. खाने में चोकर की सूखी रोटियां दी जाती थीं. जरा सी गलती होने या सवाल पूछने पर लोहे की रॉड से पीटा जाता था और कई बार भाले जैसी नुकीली चीज से घायल कर दिया जाता था.’ रामू ने कहा, ‘हर समय डर बना रहता था. पता नहीं कब किस बात पर फिर मारपीट शुरू हो जाए.’

खौफनाक था मजदूरों का फैक्ट्री में बीता समय

एक राष्ट्रीय दैनिक अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, श्रमिकों को यातना की वजह से चिल्लाने पर बस-ट्रकों की फैन बेल्टों से तब तक पीटा जाता था, जब तक वे बेहोश ने हो जाएं. अगर कोई विरोध करता था तो उनके ऊपर पिटबुल कुत्ता छोड़ दिया जाता था, जो उनके शरीर में अपने पंजे और दांत गड़ा देता था. उनके ऊपर पेचकस से हमला किया जाता था. 

चोट लगने के बाद सभी की मामूली मरहम पट्टी करवाकर वापस फैक्ट्री में भेज दिया जाता था. सभी को वहीं ‘टिनशेड की कैद’ में अमानवीय हालात में रहना पड़ता था.  उन्हें सोने के लिए बेहद कम समय मिलता था. काम भी 15 घंटे से ज्यादा करवाया जाता था. थकान होने पर उन्हें बैठने तक की इजाजत नहीं थी. काम करते वक्त उन्हें 5-5 फीट की दूरी पर बैठाया जाता था. कभी कभी तो उन्हें लाइट रहने तक काम करना पड़ता था. 

कोई श्रमिक यहां पर डेढ़ साल से कैद था तो कोई 6 महीने से. ढंग से भोजन न मिलने और लगातार यातना की वजह से उनके शरीर पर मांस तो बचा ही नहीं था, केवल चमड़ियों के नीचे हड्डियों का ढांचा बचा था. 

11 महीने तक परिवार से बात नहीं हुई

उत्तर प्रदेश के औरैया निवासी शिवम कुमार ने अपने शरीर पर चोट के निशान दिखाते हुए महीनों की कैद का दर्द बयां किया. वहीं, सीतापुर निवासी जगदीश ने कहा कि सबसे ज्यादा तकलीफ परिवार से दूर रहने की थी.

उन्होंने बताया, ‘जब भी घर जाने की बात करते थे तो और ज्यादा प्रताड़ित किया जाता था. 11 महीने तक परिवार से बात नहीं हो सकी. एक समय ऐसा आ गया था कि लगा अब शायद कभी घरवालों से मुलाकात नहीं होगी.’

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर निवासी नारायण ने बताया कि उन्हें पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से बहला-फुसलाकर लाया गया था. उन्होंने कहा, ‘पुलिस ने हमें छुड़ाया तो ऐसा लगा जैसे दूसरी जिंदगी मिल गई हो.’

मां बोलीं- जनवरी के बाद बेटे से कोई संपर्क नहीं था

शिवम की मां रानी ने बताया कि उनका बेटा गुरुग्राम काम करने गया था. वह पहले भी कुछ महीने काम करके घर लौट आता था, लेकिन जनवरी के बाद उसका कोई पता नहीं चला. उन्होंने कहा, ‘हमने हर जगह तलाश की. लगातार रोते रहे और उसके फोन का इंतजार करते रहे. दो दिन पहले तितावी थाने से फोन आया, तब जाकर पहली बार बेटे से बात हो सकी.’

डॉक्टर बोले- शरीर के साथ मानसिक जख्म भी गहरे

सरकारी अस्पताल में मजदूरों की जांच करने वाले डॉक्टर दीपांकर कुमार ने बताया कि कई मजदूरों के शरीर पर पुरानी चोटों के निशान मिले हैं. उन्होंने कहा, ‘शारीरिक चोटों के साथ मानसिक प्रताड़ना का असर भी बेहद गंभीर दिखाई दे रहा है. दो मजदूरों में गहरे मनोवैज्ञानिक आघात के संकेत मिले हैं.’ मुजफ्फरनगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) संजय कुमार वर्मा ने बताया, ‘मेडिकल जांच में मजदूरों के शरीर पर कई चोटों के निशान मिले हैं.’

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पुलिस ने दो आरोपियों को भेजा जेल, फैक्ट्री मालिक फरार

पुलिस ने इस मामले में फैक्ट्री के सुपरवाइजर शिवा त्यागी और प्रदीप बालियान को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया है. वहीं फैक्ट्री मालिक अंकित बालियान अभी फरार है और उसकी तलाश जारी है. सीओ विश्वजीत सिंह ने बताया कि बुधवार को कुछ श्रमिकों राजस्थान के न्यायालय में बयान दर्ज कराए गए हैं. इस मामले में सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी. 

हत्या के आरोप की भी हो रही जांच

मजदूरों ने पुलिस को बताया कि नवंबर 2025 में अर्जुन नाम के एक अन्य मजदूर की कथित तौर पर हत्या कर दी गई थी और उसका शव कहीं फेंक दिया गया. पुलिस अब इस दावे की भी जांच कर रही है. जांच के दायरे में गैरकानूनी कैद, बंधुआ मजदूरी, मारपीट, मजदूरी का भुगतान न करना, पहचान पत्र नष्ट करना, धमकाना, पीड़ितों का पुनर्वास और अर्जुन की कथित हत्या जैसे सभी पहलुओं को शामिल किया गया है. पुलिस की टीमें लापता लोगों के रिकॉर्ड भी खंगाल रही हैं और यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यदि हत्या हुई तो शव कहां ठिकाने लगाया गया.