Super El Niño Climate Crisis : पृथ्वी के लिए सबसे बड़ा ताप नियंत्रक माने जाने वाले महासागर अब खुद गर्मी से तपने लगे हैं. जून 2026 में समुद्रों ने गर्मी के सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिये. वैज्ञानिक इसे सामान्य मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और तेजी से विकसित हो रहे सुपर अल नीनो के संयुक्त प्रभाव का संकेत मान रहे हैं. यूरोपीय संघ की कॉपरनिकस मरीन सर्विस के अनुसार, समुद्र की सतह का औसत तापमान 20.98 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है. प्रशांत महासागर की गहराइयों में सामान्य से छह डिग्री अधिक तापमान दर्ज होना इस बात का संकेत है कि आने वाले महीनों में दुनिया के मौसम का संतुलन और अधिक बिगड़ सकता है.
अल नीनो प्रशांत महासागर में बनने वाली प्राकृतिक जलवायु घटना है, लेकिन जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से दो डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है तो इसे सुपर अल नीनो कहा जाता है. इस बार समुद्र की 50 से 150 मीटर गहराई तक असामान्य गर्मी दर्ज की गयी है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इसका प्रभाव वर्ष 2026 के अंत और 2027 की शुरुआत में चरम पर पहुंच सकता है. इसके कारण दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भीषण गर्मी, लंबे सूखे, अचानक बाढ़, समुद्री तूफान और मरीन हीटवेव जैसी घटनाएं और अधिक तीव्र हो सकती हैं. वर्ष 2026 के पहले छह महीनों में ही दुनिया के करीब 82 प्रतिशत महासागर मरीन हीटवेव की चपेट में आ चुके हैं.
भारत भी खतरे की जद में
महासागरों की यह असामान्य गर्मी भारत के लिए भी चिंता का विषय बन चुकी है. प्रशांत महासागर में बढ़ी गर्मी के कारण मॉनसूनी हवाओं का प्रवाह प्रभावित हुआ है. इसके चलते जून में देश में सामान्य से करीब 42 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गयी. यदि जुलाई से सितंबर तक भी वर्षा सामान्य से कम रही, तो खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होगी और अनाज उत्पादन में 10 से 15 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है. इसका सीधा असर खाद्य महंगाई, जल संकट और बिजली की बढ़ती मांग के रूप में सामने आयेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति नहीं सुधरी, तो आने वाले महीनों में देश के कई हिस्सों में सूखे जैसी परिस्थितियां बन सकती हैं.
जलवायु संकट बना गंभीर चुनौती
विशेषज्ञ मानते हैं कि महासागरों का लगातार गर्म होना पृथ्वी के लिए गंभीर चेतावनी है. समुद्र जितनी अधिक गर्मी सोखेंगे, उतनी ही अधिक ऊर्जा वातावरण में पहुंचेगी और चरम मौसम की घटनाएं बढ़ेंगी. इसका असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कृषि, मत्स्य उद्योग, जल संसाधन, जैव विविधता और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा. वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कटौती, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा और जल संरक्षण जैसे कदम अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुके हैं.
जानिए, ऐसा क्यों हो रहा
- ग्रीनहाउस गैसों में लगातार वृद्धि : कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी गैसें पृथ्वी की गर्मी को वातावरण में रोक रही हैं
- महासागर अधिक गर्मी सोख रहे हैं : ग्लोबल वार्मिंग की लगभग 90 प्रतिशत अतिरिक्त गर्मी समुद्रों में जमा हो रही है.
- सुपर अल नीनो का असर : प्रशांत महासागर की असामान्य गर्मी वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित कर रही है
- जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता : कोयला, पेट्रोल और डीजल के अत्यधिक उपयोग से तापमान लगातार बढ़ रहा है
- वनों की कटाई : जंगल कम होने से कार्बन अवशोषण घट रहा है और वातावरण में गर्मी बढ़ रही है.
- समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव : कोरल रीफ और समुद्री जैव विविधता के क्षरण से महासागरों की प्राकृतिक संतुलन क्षमता कमजोर पड़ रही है
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