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स्टेज और संसद एक नहीं

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स्टेज और संसद एक नहीं
Advocate Rakesh Kumar Singh

स्टेज और संसद का फ़र्क़ समझिए. मंच की रौशनी और संसद की जिम्मेदारी में जमीन-आसमान का अंतर है. एक जगह आपको कुछ घंटे भीड़ का मन बहलाना होता है; दूसरी जगह पूरी एक पीढ़ी का भविष्य गढ़ना होता है. मंच पर ग़लती हुई तो परदा गिर जाता है और तालियां भुला देती हैं; पर सदन में लिया गया एक ग़लत फ़ैसला करोड़ों ज़िंदगियों पर सालों भारी पड़ता है. अफ़सोस यह है कि हमारी राजनीति ने यह बुनियादी फ़र्क़ ही मिटा दिया है – जिसने जितनी ज़्यादा भीड़ खींची, उसे उतनी जल्दी टिकट थमा दिया गया.

भांड को संसद भेजोगे तो नौटंकी ही मिलेगी. जिस आदमी की पूंजी केवल लोकप्रियता और तमाशा हो, उससे गंभीर नीति, दूरदृष्टि और कानून की समझ की उम्मीद क्यों पाली जाए? पर्दे पर चमकना अलग हुनर है, और बजट के आँकड़ों, किसान की पीड़ा, या किसी विधेयक की बारीकियों को समझना बिल्कुल अलग साधना. कला अपनी जगह आदरणीय है – उस पर कोई उँगली नहीं उठा रहा. लेकिन ग्लैमर को योग्यता का प्रमाणपत्र मान लेना लोकतंत्र के साथ सरासर धोखा है. हम चेहरे की चमक देखकर मुग्ध हो जाते हैं, और यह पूछना भूल जाते हैं कि इस चमक के पीछे कोई सोच, कोई नीयत, कोई काबिलियत भी है या नहीं.

असली सवाल कलाकार से नहीं, मतदाता से पूछा जाना चाहिए. हम वोट किस आधार पर देते हैं – चेहरे की चमक पर, फ़ैन-फ़ॉलोइंग की गिनती पर, किसी गीत या संवाद की खुमारी पर; या उस काम पर जो वह पांच साल सदन में करेगा? जो जनता रील देखकर बटन दबाती है, रिकॉर्ड देखकर नहीं, वह अपनी ही किस्मत के साथ जुआ खेलती है. और जो जनता चुनाव के बाद अपने प्रतिनिधि से हिसाब नहीं मांगती, वह दरअसल अपनी ही गुलामी पर खुद हस्ताक्षर करती है.

लोकतंत्र पांच साल में एक बार बजने वाली घंटी नहीं है – यह रोज़ की जागरूकता है, सवाल पूछने का साहस है, और भीड़ के साथ बहने से इनकार करने की रीढ़ है. राजा आसमान से नहीं टपकता; वह हमारी ही शक्ल का होता है, हमारी ही पसंद का आईना होता है.

इसलिए अगली बार बटन दबाने से पहले ठहरकर सोचिए – आप मनोरंजन चुन रहे हैं या क़ानून बनाने वाला? नाच-गाना देखकर चुनेंगे तो नौटंकी मिलेगी; सोच-समझकर चुनेंगे तो विमर्श. बदलाव मंच से नहीं आएगा – वह वोट देने वाले की कसौटी से शुरू होगा.

Advocate Rakesh Kumar Singh 1
एडवोकेट राकेश कुमार सिंह
चेयरमैन- भारत उत्थान संघ, खाना चाहिए फाउंडेशन, महाराणा प्रताप फाउंडेशन
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प्रीतीश सहाय, इन्हें इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया इंडस्ट्री में 12 वर्षों से अधिक का अनुभव है. ये वर्तमान में प्रभात खबर डॉट कॉम के साथ डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं. मीडिया जगत में अपने अनुभव के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण विषयों पर काम किया है और डिजिटल पत्रकारिता की बदलती दुनिया के साथ खुद को लगातार अपडेट रखा है. इनकी शिक्षा-दीक्षा झारखंड की राजधानी रांची में हुई है. संत जेवियर कॉलेज से ग्रेजुएट होने के बाद रांची यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की डिग्री हासिल की. इसके बाद लगातार मीडिया संस्थान से जुड़े रहे हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत जी न्यूज से की थी. इसके बाद आजाद न्यूज, ईटीवी बिहार-झारखंड और न्यूज 11 में काम किया. साल 2018 से प्रभात खबर के साथ जुड़कर काम कर रहे हैं. प्रीतीश सहाय की रुचि मुख्य रूप से राजनीतिक खबरों, नेशनल और इंटरनेशनल इश्यू, स्पेस, साइंस और मौसम जैसे विषयों में रही है. समसामयिक घटनाओं को समझकर उसे सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाने की इनकी हमेशा कोशिश रहती है. वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़े मुद्दों पर लगातार लेखन करते रहे हैं. इसके साथ ही विज्ञान और अंतरिक्ष से जुड़े विषयों पर भी लिखते हैं. डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में काम करते हुए उन्होंने कंटेंट प्लानिंग, न्यूज प्रोडक्शन, ट्रेंडिंग टॉपिक्स जैसे कई क्षेत्रों में काम किया है. तेजी से बदलते डिजिटल दौर में खबरों को सटीक, विश्वसनीय और आकर्षक तरीके से प्रस्तुत करना पत्रकारों के लिए चुनौती भी है और पेशा भी, इनकी कोशिश इन दोनों में तालमेल बनाते हुए बेहतर और सही आलेख प्रस्तुत करना है. वे सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की जरूरतों को समझते हुए कंटेंट तैयार करते हैं, जिससे पाठकों तक खबरें प्रभावी ढंग से पहुंच सकें. इंटरनेशनल विषयों में रुचि होने कारण देशों के आपसी संबंध, वार अफेयर जैसे मुद्दों पर लिखना पसंद है. इनकी लेखन शैली तथ्यों पर आधारित होने के साथ-साथ पाठकों को विषय की गहराई तक ले जाने का प्रयास करती है. वे हमेशा ऐसी खबरों और विषयों को प्राथमिकता देते हैं जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय लिहाज से महत्वपूर्ण हों. रूस यूक्रेन युद्ध, मिडिल ईस्ट संकट जैसे विषयों से लेकर देश की राजनीतिक हालात और चुनाव के दौरान अलग-अलग तरह से खबरों को पेश करते आए हैं.
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