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NDA VS MGB: महागठबंधन के अंदरूनी कलह पर एनडीए की एकजुटता पड़ी भारी

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NDA VS MGB: महागठबंधन के अंदरूनी कलह पर एनडीए की एकजुटता पड़ी भारी
तेजस्वी यादव

NDA VS MGB: बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की करारी हार कोई अप्रत्याशित घटना नहीं, बल्कि लंबे समय से बन रही वह राजनीतिक दरार थी जिसे चुनाव परिणामों ने सिर्फ उजागर कर दिया. महागठबंधन के भीतर जिस तरह की खींचतान, आपसी सामंजस्य, विश्वास का अभाव और नेतृत्व को लेकर अंतिम समय तक हिचकिचाहट रही उसका प्रतिफल यह चुनाव परिणाम रहा. 

एक ओर जहां महागठबंधन बिखरा रहा, वहीं एनडीए ने एक संगठित, स्पष्ट और एकजुट अभियान चलाया. महागठबंधन के सबसे चमकदार चेहरा और बड़ा वोट-खींचू नेता माने जाने वाले तेजस्वी यादव इस हार के केंद्र में रहे. एक ऐसी हार जो अब पीछे मुड़कर देखने पर, काफी हद तक खुद निर्मित लगती है. महीनों तक एक ओर जहां विपक्षी दल आपसी सामंजस्य बिठाने में ऊहापोह की स्थिति में रहे, वही एनडीए गठबंधन में सीट सामंजस्य को लेकर पर्दे के बाहर किसी भी तरह की जिच सामने नहीं आयी. 

सीटों का बंटवारा बना सबसे बड़ी परेशानी

सीट का बंटवारा होते-होते जहां महागठबंधन फ्रेंडली फाइट तक जा पहुंचा, वहीं एनडीए के नाराज उम्मीदवारों को भाजपा और जदयू के वरिष्ठ नेता मनाने में जुूटे रहे. इसमें दोनों दल सफल भी रहे. नामांकन का समय आते-आते तक जहां एनडीए के नेताओं और कार्यकर्ताओं में उत्साह और जोश दिखायी दे रहा था, वहीं गठबंधन एक मजबूत राजनीतिक मोर्चे की बजाय अंदरूनी सौदेबाजी में उलझा एक थका हुआ समूह दिखाई देने लगा.

एनडीए के बीच जहां परस्पर सहयोग और विश्वास का भाव दिख रहा था, वहीं महागठबंधन में शामिल हर दल अविश्वास की मानसिकता में काम कर रहा था. इस खींचतान का केंद्र बिंदु थे-तेजस्वी यादव, जो रणनीतिक लचीलेपन के बजाय प्राथमिकता पर अड़े रहने की छवि से बाहर नहीं आ सके. खुद को सीएम पद का उम्मीदवार घोषित करने को लेकर इस तरह से अड़े रहे, कि जब तक उनके नाम पर मुहर न लग गयी, तब तक अपनी सक्रियता भी कम करके रखी. वहीं एनडीए चुनाव घोषणा से महीनों पहले से ही चुनाव तैयारी में जुटा रहा.

पारिवारिक दखल और संगठनात्मक कमजोरी

तेजस्वी यादव की ‘युवा उत्तराधिकारी’ की छवि वर्षों से सावधानी से गढ़ी गई, लेकिन चुनाव ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह छवि अभी भी बेहद नाज़ुक है. लालू परिवार के भीतर की असहमति, खासकर भाई-बहनों की नाराज़गी, राजनीतिक बोझ बनकर उभरी. तेजस्वी के करीबी माने जाने वाले संजय यादव के प्रभाव को लेकर परिवार में असंतोष रहा, जिसने पार्टी के निर्णयों को एक संकुचित घेरे में सीमित कर दिया.

उनके अपने ही सगे भाई ने तेजस्वी को ‘जयचंदों’ से घिरा तक बता दिया. उनकी सबसे प्रिय बहन ने भी परिवार के भीतर घुसपैठियों के प्रभाव की बात संकेतों में कहा, इससे परिवार की अंदरूनी लड़ाई सतह पर आ गयी.

पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी असहज दिख रहे थे. यहां तक की तेजस्वी यादव से कौन मिलेगा और कौन नहीं, कथित तौर पर संजय यादव द्वारा तय किये जाने की बात भी पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा बतायी जा रही थी. यह बात, तेजस्वी यादव तक भी पहुंची, लेकिन वो किसी कार्यकर्ता से ज्यादा अपने ‘भरोसेमंद’ पर भरोसा करते रहें. राजद नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि सीटों के बंटवारे में जिताऊ उम्मीदवार के बनिस्पत खास व्यक्ति के पसंद के उम्मीदवार को टिकट दिया गया.

इतना ही नहीं महागठबंधन के सहयोगियों को भी राजद की ओर से इस तरह से टिकट दिये गये, जैसे यह महज एक औपचारिकता निभाने की रस्म अदायगी हो.

एनडीए की मजबूती बनाम महागठबंधन का बिखराव

बिहार की राजनीति में अनुशासन और स्पष्ट संदेश सफलता की कुंजी है. सुशासन बिहार के लिए एक ऐसा मंत्र है, जिसकी काट महागठबंधन को नहीं मिला. बिहार के वोटर सुशासन को पसंद करते हैं और सुशासन की गारंटी उन्हें नीतीश कुमार में ज्यादा दिखी. नीतीश कुमार की सुशासन की छवि को अब तक कोई भी दल तोड़ने में सफल नहीं हुआ है. 

तेजस्वी के चुनाव प्रचार और उनकी क्षमता पर संदेह नहीं किया जा सकता है. वह महागठबंधन के अकेले स्टार प्रचारक और वोट खींचने वाले नेता हैं. लेकिन सिर्फ भीड़ खींचना पर्याप्त नहीं होता. इस चुनाव में उन्होंने नेता और समन्वयक दोनों की भूमिका निभाने की कोशिश की और दोनों मोर्चों पर उनकी सीमाएं स्पष्ट हो गयी. महागठबंधन की यह हार सिर्फ एक राजनीतिक गठबंधन का पतन नहीं, बल्कि कुप्रबंधन और कमजोर रणनीति का सबक भी है, जिसे बिहार की राजनीति आने वाले वर्षों तक याद रखेगी.

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