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Judiciary: लंबित मामलों के निपटान के लिए संसाधनों को बढ़ाने पर दिया जा रहा है जोर

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Judiciary: लंबित मामलों के निपटान के लिए संसाधनों को बढ़ाने पर दिया जा रहा है जोर

Judiciary: अदालतों में लंबित मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. केंद्र सरकार के अनुसार अदालतों में कुल 5.49 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं. सुप्रीम कोर्ट में 90897 मामले, सभी हाई कोर्ट में 6363406 मामले और निचली अदालतों में 4.84 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं. वैसे तो मुकदमों का निपटारा न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है. लेकिन शीर्ष अदालत कई बार लंबित मामलों की बढ़ती संख्या को लेकर चिंता जाहिर कर चुकी है.


शीर्ष अदालत द्वारा अप्रैल 2024 में लंबित मामलों को कम करने की योजना पर गठित समिति ने पुराने लंबित मामलों का समयबद्ध तरीके से निपटारा करने के लिए जिला न्यायपालिका में लंबित मामलों को कम करने के लिए कार्य योजना तैयार करने करने को कहा था. साथ ही काफी समय से लंबित मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने की बात कही थी. 


मामलों के निपटारे में तेजी लाने के लिए न्यायाधीशों के बीच मामलों का समान वितरण, अधूरे और स्थगित मामलों का प्रभावी निपटारा, वैकल्पिक विवाद समाधान का प्रभावी उपयोग, प्रौद्योगिकी का उपयोग, समय पर निगरानी और निपटान को सुगम बनाने के लिए बिना तारीख वाले मामलों का प्रबंधन और  न्यायिक अधिकारियों को पर्याप्त मानव संसाधन देने की सिफारिश की थी. इसके अलावा मामले के प्रगति की नियमित निगरानी और कार्य योजना की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए नियमित समीक्षा बैठक, प्रक्रियात्मक देरी को दूर करने के लिए हितधारकों की भागीदारी और सभी जिले की विशिष्ट परिस्थितियों को पूरा करने के लिए रणनीति बनाने का सुझाव दिया. 


लंबित मामलों के निपटारे के लिए उठाए गए कदम


राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (एनजेडीजी) को उन्नत डैशबोर्ड के साथ अपग्रेड किया गया है, जो लंबित मामलों की पहचान, प्रबंधन और कमी लाने के लिए एक निगरानी उपकरण के तौर पर काम कर रहा है. यह लंबित मामलों को कम करने के लिए नीतिगत फैसले लेने के लिए समय पर जानकारी मुहैया कराता है और अदालतों के कामकाज की बेहतर निगरानी और कुशल संसाधन प्रबंधन की कमी को दूर करने का काम करता है. 14वें वित्त आयोग ने 2015-2020 के दौरान जघन्य अपराधों, महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगजनों और असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्तियों से जुड़े दीवानी मामलों सहित विशिष्ट श्रेणियों के मामलों के त्वरित निपटारे के लिए 1800 त्वरित न्यायालयों (एफटीसी) की स्थापना की सिफारिश की थी और मौजूदा समय में ऐसे 866 अदालत काम कर रहे हैं. 


बलात्कार और बाल यौन उत्पीड़न संरक्षण अधिनियम (पीओसीएसओ) से संबंधित लंबित मामलों के समयबद्ध निपटान के लिए विशेष रूप से गठित फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (एफटीएससी) बनाया गया है. आंकड़ों के अनुसार 30 सितंबर 2025 तक 29 राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में 773 एफटीएससी, जिनमें 400 विशेष पीओसीएसओ अदालत काम कर रहे हैं. न्याय व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़, सुगम और सुलभ बनाने के मकसद से ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण (2023-2027) के तहत 7210 करोड़ रुपये के खर्च को मंजूरी दी गयी है. हाईकोर्ट और जिला अदालतों में  579.53 करोड़ दस्तावेजों का डिजिटलीकरण किया जा चुका है. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये 3.81 करोड़ से अधिक सुनवाई हो चुकी हैं और 11 हाई कोर्ट में लाइव स्ट्रीमिंग की सुविधा उपलब्ध है. यह जानकारी विधि एवं न्याय मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और संसदीय कार्य मंत्रालय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में दी.

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