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Home National पहले ‘भाई’ और फिर ‘मामा’, क्या असम में शिवराज का रिकॉर्ड तोड़ पाएंगे हिमंता बिस्वा सरमा?

पहले ‘भाई’ और फिर ‘मामा’, क्या असम में शिवराज का रिकॉर्ड तोड़ पाएंगे हिमंता बिस्वा सरमा?

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पहले ‘भाई’ और फिर ‘मामा’, क्या असम में शिवराज का रिकॉर्ड तोड़ पाएंगे हिमंता बिस्वा सरमा?
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा. कोलाज फोटो: प्रभात खबर

Himanta Biswa Sarma: असम विधानसभा चुनाव के नतीजे सोमवार 4 मई 2026 को घोषित कर दिए गए हैं. भाजपा के वरिष्ठ नेता और निवर्तमान मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा लगातार दूसरी बार अपनी कुर्सी बचाने में सफल हो गए हैं. इस चुनाव में उन्हें युवा मतदाताओं का भरपूर साथ मिला है. उन्होंने चुनाव से पहले मार्च में युवाओं के सामने ‘मामा’ वाली छवि पेश की थी. उन्होंने अपने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि पहले वे ‘भाई’ थे, फिर ‘दादा’ बने और अब ‘मामा’ बन गए हैं. ये ‘मामा’ वाली छवि काम कर गया है और युवाओं ने उन्हें सिर माथे पर बिठा लिया. हालांकि, देश की राजनीति में ‘मामा’ की छवि मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की ही थी. लेकिन, हिमंता बिस्वा सरमा ने भी असम में ‘मामा’ कार्ड खेला और उसका असर साफ दिखाई दे रहा है.

भाई से मामा कैसे बने हिमंता बिस्वा सरमा

15 मार्च 2026 को एक इंटरव्यू के दौरान हिमंता बिस्वा सरमा ने खुद कहा था कि 27 साल की उम्र में वे ‘भाई’ थे, फिर ‘दादा’ बने और अब 55 की उम्र में ‘मामा’ बन गए हैं. यह बदलाव सिर्फ शब्दों का नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक ब्रांडिंग का हिस्सा बन गया है. असम में ‘मामा’ शब्द का मतलब कई जगहों पर ‘अंकल’ जैसा ही होता है, जो अपनापन और स्नेह दर्शाता है. यही वजह है कि युवाओं और आम मतदाताओं के बीच उनकी यह छवि तेजी से लोकप्रिय हुई.

असम चुनाव 2026 में जीता युवाओं का भरोसा

2026 के असम विधानसभा चुनाव में हिमंता बिस्वा सरमा ने लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल करने में कामयाबी हासिल कर ली है. इस जीत में सबसे बड़ा योगदान युवा मतदाताओं का रहा. चुनाव से पहले उन्होंने खुद को ‘मामा’ के रूप में पेश किया, जिससे एक पारिवारिक और भरोसेमंद छवि बनी. यह रणनीति कामयाब रही, क्योंकि युवाओं ने उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा जो उनके करीब है, समझता है और मार्गदर्शन कर सकता है.

मामा ब्रांड के असली जनक है शिवराज

हालांकि, भारतीय राजनीति में ‘मामा’ ब्रांड की सबसे मजबूत पहचान मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ जुड़ी रही है. मध्य प्रदेश में करीब 16 साल से अधिक शासन के दौरान उन्होंने यह छवि बनाई. उनकी ‘मामा’ पहचान का आधार भावनात्मक राजनीति और सामाजिक योजनाएं थीं. खासकर, मध्य प्रदेश की बेटियों के लिए चलाई गईं लाड़ली लक्ष्मी योजना और कन्यादान योजना प्रमुख हैं. इन योजनाओं ने उन्हें बेटियों के संरक्षक के रूप में स्थापित किया, जिससे जनता ने उन्हें स्नेहपूर्वक ‘मामा’ कहना शुरू किया.

रणनीति बनाम स्वाभाविक छवि

यहां दोनों नेताओं की रणनीति में बड़ा फर्क दिखता है. शिवराज सिंह चौहान की ‘मामा’ छवि नीतियों और लंबे जनसंपर्क से बनी. जबकि, हिमंता बिस्वा सरमा की ‘मामा’ छवि तेजी से उभरी राजनीतिक ब्रांडिंग का हिस्सा है. सरमा खुद कहते हैं कि यह कोई रणनीति नहीं, बल्कि उम्र के साथ आया स्वाभाविक बदलाव है.

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क्या टूटेगा शिवराज का रिकॉर्ड?

अब सवाल यह है कि क्या हिमंता बिस्वा सरमा, शिवराज सिंह चौहान का 16 से साल का रिकॉर्ड तोड़ पाएंगे, तो जवाब अभी साफ नहीं है. शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश में करीब 16 साल तक के अपने शासनकाल के दौरान महिलाओं के लिए काम करने के बाद मामा वाली छवि पाई है. मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज सिंह चौहान का पहला कार्यकाल नवंबर 2005 से दिसंबर 2018 लगातार 13 साल तक रहा. इसके बाद उनका दूसरा कार्यकाल मार्च 2020 से दिसंबर 2023 तक करीब 3 साल 9 महीने तक का रहा. वहीं, असम में हिमंता बिस्वा सरमा 2026 का चुनाव जीतने के बाद दूसरी बार मुख्यमंत्री बनेंगे. अब देखना यह होगा कि भारतीय राजनीति के ‘मामा’ वाले जिस छवि को लेकर वे चुनावी बेड़ा पार लगाए हैं, तो क्या मध्य प्रदेश के शिवराज सिंह चौहान की तरह सही मायने में असम की महिलाओं और युवाओं के लिए ‘मामा’ साबित हो पाएंगे?

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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