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DRDO: आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम 

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DRDO: आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम 

DRDO: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने स्वदेशी रक्षा उत्पादन को गति देने के उद्देश्य से तीन महत्वपूर्ण उपकरण प्रौद्योगिकियां उद्योग क्षेत्र को हस्तांतरित की है. डीएमआरएल द्वारा हस्तांतरित प्रौद्योगिकियों में सबसे पहले ‘बीएचईएल, जगदीशपुर’ को उच्च शक्ति वाले ‘रेडोम विनिर्माण तकनीक’ दी गई है. यह रेडोम मिसाइल प्रणालियों में महत्वपूर्ण सेंसरों के लिए सुरक्षा कवर का काम करता है. यह तकनीक भारत को प्रमुख रक्षा कार्यक्रमों में आत्मनिर्भर बनाने में सहायक होगी.

दूसरी तकनीक जेएसपीएल, अंगुल को सौंपी गई है. इसमें डीएमआर-1700 स्टील शीट एवं प्लेटों का उत्पादन शामिल है. यह स्टील कमरे के तापमान पर उच्च शक्ति और फ्रैक्चर कठोरता का अद्वितीय संयोजन प्रदान करता है, जिससे रक्षा उपकरणों की मजबूती और टिकाऊपन में बढ़ोतरी होगी.  तीसरी तकनीक ‘बीएसपी, भिलाई, सेल’ को हस्तांतरित की गई है. इसके अंतर्गत ‘डीएमआर 249ए एचएसएलए स्टील प्लेट्स’ नौसेना जहाजों के निर्माण में इस्तेमाल होंगी. यह विशेष स्टील कठोर धातु कर्म एवं आगामी आवश्यकताओं को पूरा करता है और समुद्री सुरक्षा को मजबूती प्रदान करेगा.

उद्योग और अनुसंधान की भागीदारी

रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और डीआरडीओ प्रमुख डॉ. समीर वी. कामत ने उद्योग भागीदारों को ‘लाइसेंसिंग एग्रीमेंट फॉर ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी के दस्तावेज सौंपे. इस अवसर पर डॉ. समीर वी. कामत ने अनुसंधान एवं विकास प्रक्रियाओं के साथ-साथ उद्योग भागीदारी की सराहना करते हुए कहा कि यह तकनीक हस्तांतरण न केवल रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण को बल देगा, बल्कि भारत की रणनीतिक क्षमताओं को भी नई ऊंचाई पर ले जायेगाृ. यह कदम न केवल तकनीकी नवाचार और आत्मनिर्भरता की दिशा में मील का पत्थर है, बल्कि उद्योग और अनुसंधान के बीच सहयोग की नई मिसाल भी प्रस्तुत करेगा.है. 

कार्यक्रम के दौरान डीएमआरएल और नागर विमानन मंत्रालय के वायुयान दुर्घटना अन्वेषण ब्यूरो (एएआईबी) के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर भी हस्ताक्षर हुए जिसके तहत डीएमआरएल की विशेषज्ञता और संसाधनों का उपयोग एएआईबी की गतिविधियों को सहयोग प्रदान करने में होगा.

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