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CSPOC: भारत में विविधता के बावजूद लोकतंत्र हुआ मजबूत 

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CSPOC: भारत में विविधता के बावजूद लोकतंत्र हुआ मजबूत 

CSPOC: संसद के संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में राष्ट्रमंडल के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों (सीएसपीओसी) के 28 वां सम्मेलन गुरुवार को शुरू हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन का उद्घाटन किया. राष्ट्रमंडल देशों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों का यह सम्मेलन चौथी बार भारत में आयोजित किया जा रहा है. इस सम्मेलन के मुख्य विषय ‘संसदीय लोकतंत्र का प्रभावी क्रियान्वयन’ है. 


सीएसपीओसी में राष्ट्रमंडल के 53 संप्रभु देशों की राष्ट्रीय संसद के स्पीकर और पीठासीन अधिकारी शामिल हो रहे हैं. इसके अलावा 14 अर्ध-स्वायत्त संसद के पीठासीन अधिकारी, राष्ट्रमंडल संसदीय संघ(सीपीए) के महासचिव और अन्य अधिकारी शामिल हैं. कुल 42 सीएसपीओसी सदस्य देशों और 4 अर्ध-स्वायत्त संसद से 61 पीठासीन अधिकारी जिनमें 45 स्पीकर और 16 डिप्टी स्पीकर इस कार्यक्रम में शामिल हो रहे हैं. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला इस सम्मेलन के अध्यक्ष हैं.


विविधता भारत के लोकतंत्र की ताकत 

सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि लोकतंत्र में अध्यक्ष की भूमिका सबसे अलग होती है. अध्यक्ष को बोलने का कम मौका मिलता है, लेकिन उनकी जिम्मेवारी दूसरों की बात सुनने और यह सुनिश्चित करने की होती है कि सभी को बोलने का मौका मिले. प्रधानमंत्री ने कहा कि देश जब आजाद हुआ तो तो यह आशंका व्यक्त की गई थी कि इतनी विविधता वाले देश में लोकतंत्र टिक नहीं पाएगा. लेकिन इसी विविधता को देश ने लोकतंत्र की ताकत बना लिया. एक और बड़ी चिंता यह थी कि यदि किसी तरह भारत में लोकतंत्र कायम भी रह जाए, तो विकास नहीं होगा. भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि लोकतांत्रिक संस्थाएं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया लोकतंत्र को स्थायित्व, गति और व्यापकता प्रदान करती हैं. 


प्रधानमंत्री ने कहा कि मौजूदा समय में भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है. भारत सबसे बड़ा वैक्सीन उत्पादक, दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक, तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप परितंत्र, तीसरा सबसे बड़ा विमानन बाजार, चौथा सबसे बड़ा रेलवे नेटवर्क, तीसरा सबसे बड़ा मेट्रो रेल नेटवर्क, सबसे बड़ा दूध उत्पादक और दूसरा सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश है. लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला, केंद्रीय मंत्री, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश,  राष्ट्रमंडल देशों की संसदों के पीठासीन अधिकारी, सांसद इस दौरान मौजूद रहे.

 
एआई और सोशल मीडिया से कामकाज हुआ है बेहतर


सम्मेलन को संबोधित करते हुए लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और सोशल मीडिया के कारण लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यकुशलता और प्रभावशीलता में वृद्धि हुई है. साथ ही इसके दुरुपयोग से दुष्प्रचार, साइबर अपराध और सामाजिक ध्रुवीकरण जैसी गंभीर समस्या भी पैदा हुई है. इन चुनौतियों से निपटना विधायिकाओं की सामूहिक जिम्मेदारी है. इस सम्मेलन में महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर गहन विचार-विमर्श होगा. 

इस सम्मेलन में संसद में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: नवाचार, निगरानी और अनुकूलन के बीच संतुलन स्थापित करना, सोशल मीडिया और उसका सांसदों पर प्रभाव, संसद के प्रति जन सामान्य की समझ बढ़ाने और मतदान के बाद भी नागरिकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए नवीन रणनीति और संसद सदस्यों और संसदीय कर्मियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, कल्याण और लोकतांत्रिक संस्थानों को सुदृढ़ बनाने में अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों की भूमिका पर चर्चा होगी. 

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इनोवेशन पर अगर अंकुश न हो, तो जाेखिम बढ़ते हैं

राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने कहा कि संसद के लिए जवाबदेह एआई विकसित करने में इंसानों का संस्थागत ज्ञान जरूरी है. बिना रोक-टोक के इनोवेशन में जोखिम है, जबकि इनोवेशन के बिना रोक-टोक से ठहराव आ सकता है. संसद में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सच्चाई पर आधारित होना चाहिए, नैतिकता से बंधा होना चाहिए, मानवीय विवेक से निर्देशित होना चाहिए और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए.


एआई विकसित करने के लिए हाइब्रिड दृष्टिकोण की आवश्यकता के बारे में बताते हुए हरिवंश ने कहा कि जब कोई इंसान किसी नए संगठन में प्रवेश करता है, तो वे अपने साथ दो ज़रूरी गुण लाते हैं. कौशल और ज्ञान. कौशल हासिल किए जा सकते हैं, ट्रांसफर किए जा सकते हैं, या आउटसोर्स किए जा सकते हैं. हालांकि, ज्ञान प्रासंगिक होता है और संस्था के भीतर गहराई से जुड़ा होता है. संसदीय ज्ञान अद्वितीय है. यह दशकों से बहस, फैसलों, परंपराओं और संवैधानिक प्रथाओं के माध्यम से बनता है. यही सिद्धांत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भी समान रूप से लागू होता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि  संसद के लिए जवाबदेह एआई विकसित करने में इंसानों का संस्थागत ज्ञान जरूरी है.

उन्होंने कॉमनवेल्थ देशों के बीच एआई के इस्तेमाल पर ज़्यादा संसदीय सहयोग का भी आह्वान किया.गौरतलब है कि सीएसपीओसी राष्ट्रमंडल के स्वतंत्र और संप्रभु देशों की संसदों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों को एक साझा मंच पर लाने का प्लेटफार्म है. इसकी स्थापना वर्ष 1969 में कनाडा के ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ के तत्कालीन अध्यक्ष लुसिएन लेमोरेक्स की पहल पर हुई थी. इसका मकसद संसद के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों द्वारा निष्पक्षता व न्याय को बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करना है. यह दो दिवसीय सम्मेलन भारत चौथी बार होस्ट कर रहा है, इससे पहले यह 1971, 1986 और 2010 में होस्ट किया गया था.

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